जब मन हो
उत्साह की कमी
५ श्लोक
- श्लोक २.३क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥हे पार्थ! ऐसा नामर्द मत हो! यह तुझे शोभा नहीं देता। अरे शत्रुओं को ताप देनेवाले! अन्तःकरण की इस क्षुद्र दुर्बलता को छोड़कर (युद्ध के लिए) खड़ा हो!
- श्लोक २.४७कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥कर्म करने मात्र का तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभी भी तेरे अधिकार अर्थात् ताबे में नहीं; (इसलिए मेरे कर्म का) अमुक फल मिले, यह हेतु (मन में) रखकर काम करनेवाला न हो, और कर्म न करने का भी तू आग्रह न कर।
- श्लोक ३.८नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥(अपने धर्म के अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म को तू कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा, कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजन भी मिलने से) तेरा शरीरनिर्वाह तक न हो सकेगा।
- श्लोक ६.५उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥(मनुष्य) अपना उद्धार आप ही करें। अपने आप को (कभी भी) गिरने न दे। क्योंकि (प्रत्येक मनुष्य) स्वयं ही अपना बन्धु (अर्थात् सहायक), या स्वयं अपना शत्रु है।
- श्लोक १८.४८सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् । सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥हे कौन्तेय! जो कर्म सहज है, अर्थात् जन्म से ही गुण-कर्म-विभागानुसार नियत हो गया है, वह सदोष हो तो भी उसे (कभी) न छोड़ना चाहिए। क्योंकि सम्पूर्ण आरम्भ अर्थात् उद्योग (किसी न किसी) दोष से वैसे ही व्याप्त रहते है, जैसे कि धुएँ से आग घिरी रहती है।