भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.४७ ·

English

मूल श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana mā karmaphalaheturbhūrmā te saṅgo'stvakarmaṇi

२.४७अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ४७

अनुवाद

कर्म करने मात्र का तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभी भी तेरे अधिकार अर्थात् ताबे में नहीं; (इसलिए मेरे कर्म का) अमुक फल मिले, यह हेतु (मन में) रखकर काम करनेवाला न हो, और कर्म न करने का भी तू आग्रह न कर।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक के चारों चरण परस्पर एक-दूसरे के अर्थ के पूरक है, इस कारण अतिव्याप्ति न होकर कर्मयोग का सारा रहस्य थोड़े में उत्तम रीति से बतला दिया गया है। और तो क्या, यह कहने में भी कोई हानि नहीं, कि यो चारों चरण कर्मयोग की चतुःसूत्री ही हैं। यह पहले कह दिया है कि 'कर्म करने मात्र का तेरा अधिकार है' परन्तु इस पर यह शंका होती है, कि कर्म का फल कर्म से ही संयुक्त होने के कारण 'जिसका पेड़ उसी का फल' इस न्याय से जो कर्म करने का अधिकारी है, वही फल का भी अधिकारी होगा। अतएव इस शंका को दूर करने के निमित्त दूसरे चरण में स्पष्ट कर दिया है, कि 'फल में तेरा अधिकार नहीं है।' फिर इससे निष्पन्न होनेवाला तीसरा यह सिद्धान्त बतलाया गया है, कि 'मन में फलाशा रखकर कर्म करनेवाला मत हो।' (कर्मफलहेतुः = कर्मफले हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः ऐसा बहुव्रीहि समाप्त होता है।) परन्तु कर्म और उसका फल दोनों संलग्न होते है, इस कारण यदि कोई ऐसा सिद्धान्त प्रतिपादन करने लगे, कि फलाशा के साथ ही साथ कर्म को भी छोड़ ही देना चाहिए, तो इसे भी सब न मानने के लिए अन्त में स्पष्ट उपदेश किया है, कि 'फलाशा को तो छोड़ दे, पर इसके साथ ही कर्म न करने का अर्थात् कर्म छोड़ने का आग्रह न कर।' सारांश 'कर्म कर' कहने से कुछ यह अर्थ नहीं होता, कि फल की आशा रख; और 'फल की आशा को छोड़' कहने से यह अर्थ नहीं हो जाता, कि कर्मों को छोड़ दे। अतएव इस श्लोक का यह अर्थ है कि फलाशा छोड़कर कर्तव्य कर्म अवश्य करना चाहिए, किन्तु न तो कर्म की आसक्ति में फँसे और न कर्म ही छोड़े – त्यागो न युक्त इह कर्मसु नापि रागः (योग॰ 5.5.54)। और यह दिखला कर की फल मिलने की बात अपने वश नहीं है, किन्तु उसके लिए और अनेक बातों की अनुकूलता आवश्यक है; अठारहवें अध्याय में फिर यही अर्थ और भी दृढ़ किया गया है (गी॰ 18.14 – 16 और रहस्य पृ. 114 एवं. प्र॰ 12 देखो) अब कर्मयोग का स्पष्ट लक्षण बतलाते है, कि इसे ही योग अथवा कर्मयोग कहते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.४७