मूल श्लोक
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
niyataṃ kuru karma tvaṃ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ śarīrayātrā'pi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ
अनुवाद
(अपने धर्म के अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म को तू कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा, कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजन भी मिलने से) तेरा शरीरनिर्वाह तक न हो सकेगा।
टिप्पणी
'अतिरिक्त' और 'तक' (अपि च) पदों से शरीरयात्रा को कम से कम हेतु कहा है। अब यह बतलाने के लिए यज्ञ-प्रकरण का आरम्भ किया जाता है कि 'नियत' अर्थात् 'नियत किया हुआ कर्म' कौन-सा है और दूसरे किस महत्त्व के कारण उसका आचरण अवश्य करना चाहिए। आजकल यज्ञयाग आदि श्रौतधर्म लुप्त-सा हो गया है, इसलिए इस विषय का आधुनिक पाठकों को कोई विशेष महत्त्व मालूम नहीं होता। परन्तु गीता के समय में इन यज्ञयागों का पूरा-पूरा प्रचार था और 'कर्म' शब्द से मुख्यतः इन्हीं का बोध हुआ करता था; अतएव गीताधर्म में इस बात का विवेचन करना अत्यावश्यक था कि ये धर्मकृत्य किए जावे या नहीं, और यदि किए जावें तो किस प्रकार का? इसके सिवा, यह भी स्मरण रहे कि यज्ञ शब्द का अर्थ केवल ज्योतिष्टोम आदि श्रौत यज्ञ या अग्नि में किसी वस्तु का हवन करना ही नहीं है (देखो गी॰ 4.32)। सृष्टि निर्माण करके उसका काम ठीक-ठीक चलते रहने के लिए, अर्थात् लोकसंग्रहार्थ, प्रजा को ब्रह्म ने चातुर्वर्ण्यविहित जो-जो काम बाँट दिए हैं, उन सबका 'यज्ञ' शब्द में समावेश होता है (देखो मभा॰ अनु॰ 48.3 और गीतार॰ पृ. 289 – 295)। धर्मशास्त्रों में इन्हीं कर्मों का उल्लेख है और इस 'नियत' शब्द से वे ही विवक्षित हैं। इसलिए कहना चाहिए कि यद्यपि आजकल यज्ञ-याग लुप्तप्राय हो गए हैं, तथापि यज्ञ-चक्र का यह विवेचन अब भी निरर्थक नहीं है। शास्त्रों के अनुसार ये सब कर्म काम्य हैं, अर्थात् इसलिए बतलाए गए हैं कि मनुष्य का इस जगत में कल्याण होवे और उसे सुख मिले। परन्तु पीछे दूसरे अध्याय (गी॰ 2.41 – 44) में यह सिद्धान्त है कि मीमांसकों के ये सहेतुक का काम्य कर्म मोक्ष के लिए प्रतिबन्धक हैं, अतएव वे नीचे दर्जे के हैं; और मानना पड़ता है कि अब तो उन्हीं कर्मों को करना चाहिए; इसलिए अगले श्लोकों में इस बात का विस्तृत विवेचन किया गया है, कि कर्मों का शुभाशुभ लेप अथवा बन्धकत्व कैसे मिट जाता है, और उन्हें करते रहने पर भी नैष्कर्म्यावस्था क्योंकर प्राप्त होती है। इस समग्र विवेचन भारत में वर्णित नारायणीय या भागवतधर्म के अनुसार है (देखो मभा॰ शां॰ 340)।
— Lokmanya Tilak