मूल श्लोक
क्लैव्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
klaivyaṃ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate kṣudraṃ hṛdayadaurbalyaṃ tyaktvottiṣṭha parantapa
अनुवाद
हे पार्थ! ऐसा नामर्द मत हो! यह तुझे शोभा नहीं देता। अरे शत्रुओं को ताप देनेवाले! अन्तःकरण की इस क्षुद्र दुर्बलता को छोड़कर (युद्ध के लिए) खड़ा हो!
टिप्पणी
इस स्थान पर हमने परन्तप शब्द का अर्थ कर तो दिया है; परन्तु बहुतेरे टीकाकारों का यह मत हमारी राय में युक्तिसंगत नहीं है, कि अनेक स्थानों पर आने वाले विशेषण-रूपी सम्बोधन या कृष्ण-अर्जुन के नाम गीता में हेतुगर्भित अथवा अभिप्रायसहित प्रयुक्त हुए हैं। हमारा मत है कि पद्यरचना के लिए अनुकूल नामों का प्रयोग किया है, और उनमें कोई विशेष अर्थ उद्दिष्ट नहीं है। अतएव कई बार हम ने श्लोक में प्रयुक्त नामों का हूबहू अनुवाद न कर 'अर्जुन' या 'श्रीकृष्ण' ऐसा साधारण अनुवाद कर दिया है।
— Lokmanya Tilak