मूल श्लोक
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ
अनुवाद
हे कौन्तेय! जो कर्म सहज है, अर्थात् जन्म से ही गुण-कर्म-विभागानुसार नियत हो गया है, वह सदोष हो तो भी उसे (कभी) न छोड़ना चाहिए। क्योंकि सम्पूर्ण आरम्भ अर्थात् उद्योग (किसी न किसी) दोष से वैसे ही व्याप्त रहते है, जैसे कि धुएँ से आग घिरी रहती है।