जब मन हो
निराशा में
५ श्लोक
- श्लोक ४.७यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥हे भारत! जब-जब धर्म की ग्लानि होती और अधर्म की प्रबलता फैल जाती है; तब (तब) मैं स्वयं ही जन्म (अवतार) लिया करता हूँ।
- श्लोक ४.८परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥साधुओं की संरक्षा के निमित्त और दुष्टों का नाश करने के लिए, युग-युग में धर्म की संस्थापना के अर्थ मैं जन्म लिया करता हूँ।
- श्लोक ६.४०श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! क्या इस लोक में और क्या परलोक में ऐसे पुरुष का कभी विनाश होता नहीं। क्योंकि हे तात! कल्याणकारक कर्म करनेवाले किसी भी पुरुष की दुर्गति नहीं होती।
- श्लोक ९.३१क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शान्ति पाता है। हे कौन्तेय! तू खूब समझ रह, कि मेरा भक्त (कभी भी) नष्ट नहीं होता।
- श्लोक १८.७८यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥मेरा मत है कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण है और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है वही श्री विजय, शाश्वत ऐश्वर्य और नीति हैं।