भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.८ ·

English

मूल श्लोक

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge

४.८अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक ८

अनुवाद

साधुओं की संरक्षा के निमित्त और दुष्टों का नाश करने के लिए, युग-युग में धर्म की संस्थापना के अर्थ मैं जन्म लिया करता हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन दोनों श्लोकों में 'धर्म' शब्द का अर्थ केवल पारलौकि क वैदिक धर्म नहीं है, किन्तु चार वर्णों के धर्म, न्याय और नीति प्रभृति बातों का भी उसमें मुख्यता से समावेश होता है। इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि जगत में जब अन्याय, अनीति, दुष्टता और अँधाधुन्धी मच कर साधुओं को कष्ट होने लगता है और जब दुष्टों का दबदबा बढ़ जाता है, तब अपने निर्माण किए हुए जगत की सुस्थिति को स्थिर कर उसका कल्याण करने के लिए तेजस्वी और पराक्रमी पुरुष के रूप से (गी॰ 10.41) अवतार लेकर भगवान समाज की बिगड़ी हुई व्यवस्था को फिर ठीक कर दिया करते है। इस रीति से अवतार लेकर भगवान जो काम करते है उसी को 'लोकसंग्रह' भी कहते है। पिछले अध्याय में कह दिया गया है कि यही काम अपनी शक्ति और अधिकार के अनुसार आत्मज्ञानी पुरुषों को भी करना चाहिए (गीता॰ 3.20)। यह बतला दिया गया कि परमेश्वर कब और किस लिए अवतार लेता है। अब यह बतलाते है कि इस तत्त्व को परखकर जो पुरुष तदनुसार बर्ताव करते है, उनको कौन-सी गति मिलती है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.८