मूल श्लोक
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yatra yogeśvaraḥ kṛṣṇo yatra pārtho dhanurdharaḥ tatra śrīrvijayo bhūtirdhruvā nītirmatirmama
अनुवाद
मेरा मत है कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण है और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है वही श्री विजय, शाश्वत ऐश्वर्य और नीति हैं।
टिप्पणी
सिद्धान्त का सार यह है, कि जहाँ युक्ति और शक्ति दोनों एकत्रित होती हैं, वहाँ निश्चय ही ऋद्धि-सिद्धि निवास करती हैं; कोरी शक्ति से अथवा केवल युक्ति से काम नहीं चलता। जब जरासन्ध का वध करने के लिए मन्त्रणा हो रही थी, तब युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से कहा है, कि 'अन्धं बलं जडं प्राहुः प्रणेतव्यं विचक्षणैः' (सभा॰ 20.17) – बल अन्धा और जड़ है, बुद्धिमानों को चाहिए कि उसे मार्ग दिखलावें; तथा श्रीकृष्ण ने भी यह कह कर कि 'मयि नीतिर्बलं भीमे' (सभा॰ 20.3) – मुझमें नीति है और भीमसेन के शरीर में बल है – भीमसेन को साथ ले उसके द्वारा जरासन्ध का वध युक्ति से कराया है। केवल नीति बतलाने वाले को आधा चतुर समझना चाहिए। अर्थात् योगेश्वर यानी योग या युक्ति के ईश्वर और धनुर्धर अर्थात् योद्धा, ये दोनों विशेषण इस श्लोक में हेतुपूर्वक दिए गए हैं।
— Lokmanya Tilak