भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ९.३१ ·

English

मूल श्लोक

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati

९.३१अध्याय ९ · राजविद्याराजगुह्ययोग३४ में से श्लोक ३१

अनुवाद

वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शान्ति पाता है। हे कौन्तेय! तू खूब समझ रह, कि मेरा भक्त (कभी भी) नष्ट नहीं होता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

तीसवें श्लोक का भावार्थ ऐसा न समझना चाहिए, कि भगवद्भक्त यदि दुराचारी हो, तो भी वे भगवत को प्यारे ही रहते है। भगवान इतना ही कहते है कि पहले कोई मनुष्य दुराचारी भी रहा हो, परन्तु जब एक बार उसकी बुद्धि का निश्चय परमेश्वर का भजन करने में हो जाता है, तब उसके हाथ से फिर कोई भी दुष्कर्म नहीं हो सकता; और वह धीरे-धीरे धर्मात्मा होकर सिद्धि पाता है तथा इसी सिद्धि से उसके पाप का बिलकुल नाश हो जाता है। सारांश, छठे अध्याय (6.44) में जो यह सिद्धान्त किया था, कि कर्मयोग के जानने की सिर्फ इच्छा होने से ही, लाचार होकर मनुष्य शब्दब्रह्म से परे चला जाता है, अब उसे ही भक्तिमार्ग के लिए लागू कर दिखलाया है। अब इस बात का अधिक खुलासा कहते है, कि परमेश्वर सब भूतों को एक-सा कैसे है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ९, श्लोक ९.३१