जब मन हो
शोक में
६ श्लोक
- श्लोक २.११श्रीभगवानुवाच । अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥श्रीभगवान ने कहा: जिसका शोक न करना चाहिए, तू उन्हीं का शोक कर रहा है और ज्ञान की बातें करता है! किसी के प्राण (चाहे) जाएँ या (चाहे) रहें, ज्ञानी पुरुष उनका शोक नहीं करते।
- श्लोक २.१३देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥जिस प्रकार देह धारण करनेवाले को इस देह में बालपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिए) इस विषय में ज्ञानी पुरुष को मोक्ष नहीं होता।
- श्लोक २.२०न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥यह (आत्मा) न तो कभी जन्मता है और न मरता ही है; ऐसा भी नहीं है कि यह (एक बार) होकर फिर होने का नहीं है; यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, एवं शरीर का वध हो जाएँ तो भी मारा नहीं जाता।
- श्लोक २.२२वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥जिस प्रकार (कोई) मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात् शरीर का स्वामी पुराने शरीर त्याग कर दूसरे नए शरीर धारण करता है।
- श्लोक २.२७जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥क्योंकि जो जन्मता है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है; इसलिए (इस) अपरिहार्य बात का (ऊपर उल्लिखित तेरे मत के अनुसार भी) शोक करना तुझ को उचित नहीं।
- श्लोक १८.६६सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥सब धर्मों को छोड़ कर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा, डर मत।