मूल श्लोक
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
jātasya hi dhruvo mṛtyurdhruvaṃ janma mṛtasya ca tasmādaparihārye'rthe na tvaṃ śocitumarhasi
अनुवाद
क्योंकि जो जन्मता है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरता है, उसका जन्म निश्चित है; इसलिए (इस) अपरिहार्य बात का (ऊपर उल्लिखित तेरे मत के अनुसार भी) शोक करना तुझ को उचित नहीं।
टिप्पणी
स्मरण रहे कि ऊपर के दो श्लोकों में बतलाई गई उपपत्ति सिद्धान्तपक्ष की नहीं है। यह 'अथ च = अथवा' शब्द से बीच में ही उपस्थित किए हुए पूर्वपक्ष का उत्तर है। आत्मा को नित्य मानो चाहे अनित्य, दिखलाना इतना ही है कि दोनों ही पक्षों में शोक करने का प्रयोजन नहीं है। गीता का यह सच्चा सिद्धान्त पहले ही बतला चुके है, कि आत्मा सत्, नित्य अज, अविकार्य और अचिन्त्य या निर्गुण है। अस्तु; देह अनित्य है, अतएव शोक करना उचित नहीं; इसी की सांख्यशास्त्र के अनुसार, दूसरी उपपत्ति बतलाते है –
— Lokmanya Tilak