भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.२२ ·

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मूल श्लोक

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vāsāṃsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro'parāṇi tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇānyanyāni saṃyāti navāni dehī

२.२२अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक २२

अनुवाद

जिस प्रकार (कोई) मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात् शरीर का स्वामी पुराने शरीर त्याग कर दूसरे नए शरीर धारण करता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

वस्त्र की यह उपमा प्रचलित है। महाभारत में एक स्थान पर, एक घर (शाला) छोड़कर दूसरे घर में जाने का दृष्टान्त पाया जाता है (शां॰15.56) और एक अमेरिकी ग्रन्थकार ने यही कल्पना पुस्तक में नई जिल्द बाँधने का दृष्टान्त देकर व्यक्त की है। पिछले तेरहवें श्लोक में बालपन, जवानी और बुढ़ापा, इन तीन अवस्थाओं को जो न्याय उपयुक्त किया गया है, वही अब सब शरीर के विषय में किया गया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.२२