मूल श्लोक
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja ahaṃ tvāṃ sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ
अनुवाद
सब धर्मों को छोड़ कर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा, डर मत।
टिप्पणी
कोरे ज्ञानमार्ग के टीकाकारों को यह भक्ति -प्रधान उपसंहार प्रिय नहीं लगता। इसलिए ये धर्म शब्द में ही अधर्म का समावेश करके कहते है, कि यह श्लोक कठ उपनिषद के इस उपदेश के समानार्थक है कि 'धर्म-अधर्म, कृत-अकृत और भूत-भव्य, सब को छोड़कर इनके परे रहनेवाले परब्रह्म को पहचानो' (कठ॰ 2.14); तथा इसमें निर्गुण ब्रह्म की शरण में जाने का उपदेश है। निर्गुण ब्रह्म का वर्णन करते समय कठ उपनिषद का श्लोक महाभारत में भी आया है (शां॰ 329.40; 331.44)। परन्तु दोनों स्थानों पर धर्म और अधर्म दोनों पद जैसे स्पष्टतया पाए जाते हैं, वैसे गीता में नहीं है। यह सच है, कि गीता निर्गुण ब्रह्म को मानती है, और उसमें यह निर्णय भी किया गया है, कि परमेश्वर का वही स्वरूप श्रेष्ठ है (गी॰ 7.24); तथापि गीता का यह भी तो सिद्धान्त है, कि व्यक्तोपासना सुलभ और श्रेष्ठ है (12.5)। और यही भगवान श्रीकृष्ण अपने व्यक्त स्वरूप के विषय में ही कह रहे है; इस कारण हमारा यह दृढ़ मत है, कि यह उपसंहार भक्तिप्रधान ही है। अर्थात् यहाँ निर्गुण ब्रह्म विवक्षित नहीं है; किन्तु कहना चाहिए कि यहाँ पर धर्म शब्द परमेश्वर-प्राप्ति के लिए शास्त्रों में जो अनेक मार्ग बतलाए गए है, जैसे अहिंसाधर्म, सत्यधर्म, मातृ-पितृ-सेवा-धर्म, गुरु-सेवा-धर्म, यज्ञ-याग-धर्म, दान-धर्म, संन्यासधर्म आदि वही अभिप्रेत हैं। महाभारत के शान्तिपर्व (354) में एवं अनुगीता (अश्व॰ 49) में जहाँ इस विषय की चर्चा हुई है, वहाँ धर्म शब्द स मोक्ष के इन्हीं उपायों का उल्लेख किया गया है। परन्तु इस स्थान पर गीता के प्रतिपाद्य धर्म के अनुरोध से भगवान का यह निश्चयात्मक उपदेश है कि उक्त नाना धर्मों की गड़बड़ में न पड़ कर 'मुझ अकेले को ही भज, मैं तेरा उद्धार कर दूँगा, डर मत।' (देखो गीतार॰ पृ. 440)। सार यह है कि अन्त में अर्जुन को निमित्त बनाकर भगवान सभी को आश्वासन देते है, कि मेरी दृढ़ भक्ति करके मत्परायण-बुद्धि से स्वधर्मानुसार प्राप्त होनेवाले कर्म करते जाने पर इहलोक और परलोक दोनों जगह तुम्हारा कल्याण होगा; डरो मत। यही कर्मयोग कहलाता है, और सब गीताधर्म का सार भी यही है। अब बतलाते है, कि इस गीताधर्म की अर्थात् ज्ञान-मूलक-भक्ति प्रधान कर्मयोग की परम्परा आगे कैसे जारी रखी जावे –
— Lokmanya Tilak