भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.१३ ·

English

मूल श्लोक

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati

२.१३अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक १३

अनुवाद

जिस प्रकार देह धारण करनेवाले को इस देह में बालपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिए) इस विषय में ज्ञानी पुरुष को मोक्ष नहीं होता।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

अर्जुन के मन में यही तो बड़ा डर या मोह था कि 'अमुक को मैं कैसे मारूँ।' इसलिए उसे दूर करने के निमित्त तत्त्व की दृष्टि से भगवान पहले इसी का विचार बतलाते है कि मरना क्या है और मारना क्या है (श्लोक 11 – 30)। मनुष्य केवल देहरूपी निरी वस्तु ही नहीं है, वरन् देह और आत्मा का समुच्चय है। इनमें अहंकार रूप में व्यक्त होनेवाला आत्मा नित्य और अमर है। वह आज है, कल था और कल भी रहेगा ही। अतएव मरना या मारना शब्द उसके लिए उपयुक्त ही नहीं किए जा सकते और उसका शोक भी न करना चाहिए। अब बाकी रह गई देह, तो यह प्रगट ही है कि वह अनित्य और नाशवान है। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो सौ वर्ष में सही, उसका तो नाश होने ही का है – अद्य वाव्दशतान्ते वा मृत्युर्वै प्राणिनां ध्रुवः ( भाग॰ 10 – 1.36), और एक देह छूट भी गई तो कर्मों के अनुसार आगे दूसरी देह मिले बिना नहीं रहती, अतएव उसका शोक करना उचित नहीं। सारांश, देह या आत्मा, दोनों दृष्टियों से विचार सिद्ध होता है कि मरे हुए का शोक करना पागलपन है। पागलपन भले ही हो, पर यह अवश्य बतलाना चाहिए कि वर्तमान देह का नाश होते समय जो क्लेश होते है, उनके लिए शोक क्यों न करें। अतएव अब भगवान इस कायिक सुख-दुःखों का स्वरूप बतलाकर दिखलाते है कि उनका भी शोक करना उचित नहीं है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.१३