भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.११ ·

English

मूल श्लोक

श्रीभगवानुवाच ।अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śrībhagavānuvāca aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ

२.११अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ११

अनुवाद

श्रीभगवान ने कहा: जिसका शोक न करना चाहिए, तू उन्हीं का शोक कर रहा है और ज्ञान की बातें करता है! किसी के प्राण (चाहे) जाएँ या (चाहे) रहें, ज्ञानी पुरुष उनका शोक नहीं करते।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक में यह कहा गया है कि पण्डित लोगों प्राणों के जाने या रहने का शोक नहीं करते। इसमें जाने का शोक करना तो मामूली बात है, उसे न करने का उपदेश करना उचित है। पर टीकाकारों ने, प्राण रहने का शोर कैसा और क्यों करना चाहिए, यह शंका करके बहुत कुछ चर्चा की है और कई एकों ने कहा है कि मूर्ख एवं अज्ञानी लोगों का प्राण रहना, यह शोक का ही कारण है। किन्तु इतनी बाल की खाल निकालते रहने की अपेक्षा 'शोक करना' शब्द का ही 'भला या बुरा लगना' अथवा 'परवा करना' ऐसा व्यापक अर्थ करने से कोई भी अड़चन रह नहीं जाती। यहाँ इतना ही वक्तव्य है कि ज्ञानी पुरुष को दोनों बातें एक ही सी होती हैं।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.११