शिक्षाएँ
कर्तव्य और कर्म
६ श्लोक
- श्लोक २.४७कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥कर्म करने मात्र का तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभी भी तेरे अधिकार अर्थात् ताबे में नहीं; (इसलिए मेरे कर्म का) अमुक फल मिले, यह हेतु (मन में) रखकर काम करनेवाला न हो, और कर्म न करने का भी तू आग्रह न कर।
- श्लोक ३.८नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्राऽपि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥(अपने धर्म के अनुसार) नियत अर्थात् नियमित कर्म को तू कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा, कर्म करना कहीं अधिक अच्छा है। इसके अतिरिक्त (यह समझ ले कि यदि) तू कर्म न करेगा, तो (भोजन भी मिलने से) तेरा शरीरनिर्वाह तक न हो सकेगा।
- श्लोक ३.१९तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥तस्मात् अर्थात् जब ज्ञानी पुरुष इस प्रकार कोई भी अपेक्षा नहीं रखता तब, तू भी (फल की) आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्यकर्म सदैव किया कर; क्योंकि आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवाले मनुष्य को परमगति प्राप्त होती है।
- श्लोक ३.२१यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥श्रेष्ठ (अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी पुरुष) जो कुछ करता है, वही अन्य अर्थात् साधारण मनुष्य भी किया करते है। वह जिसे प्रमाण मानकर अंगीकार करता है लोग उसी का अनुकरण करते है।
- श्लोक ३.३५श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥पराये धर्म का आचरण सुख से करते बने तो भी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्य-विहित कर्म ही अधिक श्रेयस्कर है; (फिर चाहे) वह विगुण अर्थात् सदोष भले ही हो। स्वधर्म के अनुसार (बर्तने में) मृत्यु हो जावे तो भी उसमें कल्याण है, (परन्तु) परधर्म भयंकर होता है।
- श्लोक १८.४७श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥यद्यपि परधर्म का आचरण सहज हो, जो भी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्य विहित कर्म, विगुण यानी सदोष होने पर भी अधिक कल्याणकारक है। स्वभावसिद्ध अर्थात् गुण-स्वभावानुसार निर्मित की हुई चातुर्वर्ण्यव्यवस्था द्वारा नियत किया हुआ अपना कर्म करने में कोई पाप नहीं लगता।