भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.१९ ·

English

मूल श्लोक

तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

tasmādasaktaḥ satataṃ kāryaṃ karma samācara asakto hyācarankarma paramāpnoti pūruṣaḥ

३.१९अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक १९

अनुवाद

तस्मात् अर्थात् जब ज्ञानी पुरुष इस प्रकार कोई भी अपेक्षा नहीं रखता तब, तू भी (फल की) आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्यकर्म सदैव किया कर; क्योंकि आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवाले मनुष्य को परमगति प्राप्त होती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

17 से 19 तक के श्लोकों का टीकाकारों ने बहुत विपर्यास कर डाला है, इसलिए हम पहले उनका सरल भावार्थ ही बतलाते हैं। तीनों श्लोक मिलकर हेतु-अनुमान-युक्त एक ही वाक्य है। इनमें से 17 वें और 18 वें श्लोक में पहले उन कारणों का उल्लेख किया गया है कि जो साधारण रीति से ज्ञानी पुरुष के कर्म करने के विषय में बतलाए जाते है; और इन्हीं कारणों से गीता ने जो अनुमान निकाला है वह 19 वें श्लोक में कारक-बोधक 'तस्मात्' शब्द का प्रयोग करके बतलाया गया है। इस जगत में सोना, बैठना, उठना या जिन्दा रहना आदि सब कर्मों को कोई छोड़ने की इच्छा करें, तो वे छूट नहीं सकते। अतः इस अध्याय में चौथे और पाँचवें श्लोकों में स्पष्ट कह दिया गया है, कि कर्म को छोड़ देने से न तो नैष्कर्म्य होता है और न वह सिद्धि प्राप्त करने का उपाय ही है। परन्तु इस पर संन्यासमार्ग-वालों की यह दलील है, कि 'हम कुछ सिद्धि प्राप्त करने के लिए कर्म करना नहीं छोड़ते। प्रत्येक मनुष्य इस जगत में जो कुछ करता है, वह अपने या पराए लाभ के लिए ही करता है, किन्तु मनुष्य का स्वकीय परमसाध्य सिद्धावस्था अथवा मोक्ष है और वह ज्ञानी पुरुष को उसके ज्ञान से प्राप्त हुआ करता है, इसलिए उसको ज्ञान-प्राप्ति हो जाने पर कुछ प्राप्त करने के लिए नहीं रहता (श्लोक 17)। ऐसी अवस्था में, चाहे वह कर्म करें या न करें – उसे दोनों बातें समान है। अच्छा; यदि कहें कि उसे लोकोपयोगार्थ कर्म करना चाहिए, तो उसे लोगों से भी कुछ लेना-देना नहीं (श्लोक 18)। फिर वह कर्म करें ही क्यों?' इसका उत्तर गीता यों देती है, कि जब कर्म करना और न करना तुम्हें एक से हैं, तब कर्म न करने का ही इतना हठ तुम्हें क्यों है? जो कुछ शास्त्र के अनुसार प्राप्त होता जाएँ, उसे आग्रह-विहीन बुद्धि से करके छुट्टी पा जाओ। इस जगत में कर्म किसी से भी छूटते नहीं है, फिर चाहे वह ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी। अब देखने में तो यह बड़ी जटिल समस्या जान पड़ती है, कि कर्म तो छूटने से रहे और ज्ञानी पुरुष को स्वयं अपने लिए उनकी आवश्यकता नहीं! परन्तु गीता को यह समस्या कुछ कठिन नहीं जँचती। गीता का कथन यह है कि जब कर्म छूटता है ही नहीं, तब उसे करना ही चाहिए। किन्तु अब स्वार्थबुद्धि न रहने से उसे निःस्वार्थ अर्थात् निष्काम बुद्धि से किया करो। 19 वें श्लोक में 'तस्मात्' पद का प्रयोग करके यही उपदेश अर्जुन को किया गया है; एवं इसकी पुष्टि में आगे 22 वें श्लोक में यह दृष्टान्त दिया गया है, कि सब से श्रेष्ठ ज्ञानी भगवान स्वयं अपना कुछ भी कर्तव्य न होने पर भी, कर्म ही करते है। सारांश, संन्यासमार्ग के लोग ज्ञानी पुरुष की जिस स्थिति का वर्णन करते हैं, उसे ठीक मान लें तो गीता का यह वक्तव्य है कि उसी स्थिति में कर्मसंन्यास-पक्ष सिद्ध होने के बदले सदा निष्काम कर्म करते रहने का पक्ष ही और भी दृढ़ हो जाता है। परन्तु संन्यासमार्ग-वाले टीकाकारों को कर्मयोग की उक्त युक्ति और सिद्धान्त (श्लोक॰ 7,8,9) मान्य नहीं हैं; इसलिए वे उक्त कार्य-कारण-भाव को अथवा समूचे अर्थ-प्रवाह को, या आगे बतलाए हुए भगवान के दृष्टान्त को भी नहीं मानते (श्लोक॰ 22,25 और 30)। उन्होंने तीनों श्लोकों को तोड़ मरोड़कर स्वतन्त्र मान लिया है; और इनमें से पहले दो श्लोकों में जो निर्देश है कि 'ज्ञानी पुरुष को स्वयं अपना कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता,' इसी को गीता का अन्तिम सिद्धान्त मान कर इसी आधार पर यह प्रतिपादन किया है, कि भगवान ज्ञानी पुरुष से कहते है कि कर्म छोड़े दे! परन्तु ऐसा करने से तीसरे अर्थात् 19 वें श्लोक में अर्जुन को जो लगे हाथ यह उपदेश किया है कि 'आसक्ति छोड़कर कर्म कर' यह अलग हुआ जाता है और इसकी उपपत्ति भी नहीं लगती। इस पेंच से बचने के लिए इन टीकाकारों ने यह अर्थ करके अपना समाधान कर लिया है , कि अर्जुन को कर्म करने का उपदेश तो इसलिए किया है कि वह अज्ञानी था! परन्तु इतनी माथापच्ची करने पर भी 19 वें श्लोक का 'तस्मात्' पद निरर्थक ही रह जाता है; और संन्यासमार्ग-वालों का किया हुआ यह अर्थ इसी अध्याय के पूर्वापर सन्दर्भ से भी विरुद्ध होता है, एवं गीता के अन्यान्य स्थलों के इस उल्लेख से भी विरुद्ध हो जाता है, कि ज्ञानी पुरुष को भी आसक्ति छोड़ कर कर्म करना चाहिए; तथा आगे भगवान ने जो अपना दृष्टान्त दिया है, उससे भी यह अर्थ विरुद्ध हो जाता है (देखो गी॰ 2.47, 3.7, 3.25, 4.23, 6.1, 18.6 – 9 और गी॰ र॰ पृ. 321 – 324)। इसके सिवा एक बात और भी है; वह यह कि इस अध्याय में उस कर्मयोग का विवेचन चल रहा है कि जिसके कारण कर्म करने पर भी वे बन्धक नहीं होते (गी॰ 2.36); इस विवेचन के बीच में ही यह बे-सिर-पैर की-सी बात कोई भी समझदार मनुष्य न कहेगा कि 'कर्म छोड़ना उत्तम है।' फिर भला भगवान यह बात क्यों कहने लगे ? अतएव निरे साम्प्रदायिक आग्रह के और खींचातानी के ये अर्थ माने नहीं जा सकते। योगवासिष्ठ में लिखा है, कि जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष को भी कर्म करना चाहिए और जब राम ने पूछा – 'मुझे बतलाइए कि मुक्त पुरुष कर्म क्यों करें?' तब वसिष्ठ ने उत्तर दिया – ज्ञस्य नार्थः कर्मत्यागैः नार्थः कर्मसमाश्रयैः। तेन स्थितं तथा यद्यत्तत्तथैव करोत्यसौ॥ 'ज्ञ अर्थात् ज्ञानी पुरुष को कर्म छोड़ने या करने से कोई लाभ नहीं उठाना होता, अतएव वह जो जैसा प्राप्त हो जाएँ, उसे वैसा किया करता है।' (योग॰ 6. उ॰ 199.4)। इसी ग्रन्थ के अन्त में फिर गीता के ही शब्दों में पहले यह कारण दिखलाया है – मम नास्ति कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। यथाप्राप्तेन तिष्ठामि ह्यकर्मणि क आग्रहः॥ 'किसी बात का करना या न करना मुझे एक-सा ही है;' और दूसरी ही पंक्ति में कहा है, कि जब दोनों बातें एक ही सी है, तब फिर 'कर्म न करने का आग्रह ही क्यों है? जो-जो शास्त्र की रीति में प्राप्त होता जाएँ उसे मैं करता रहता हूँ' (यो॰ 6 उ॰ 216.14)। इसी प्रकार इसके पहले, योगवासिष्ठ में 'नैव तस्य कृतेनार्थो॰ ' आदि गीता का श्लोक ही शब्दशः लिया गया है, और आगे के श्लोक में कहा है कि 'यद्यथा नाम सम्पन्नं तत्तथाऽस्त्वि तरेण कि म्' – जो प्राप्त हो उसे ही (जीवन्मुक्त) किया करता है, और कुछ प्रतीक्षा करता हुआ नहीं बैठता (यो॰ 6. 125.49 – 50)। योगवासिष्ठ में ही नहीं, किन्तु गणेशगीता में भी इसी अर्थ के प्रतिपादन में यह श्लोक आया है – कि ञ्चिदस्य न साध्यं स्यात् सर्वजन्तुषु सर्वदा। अतोऽसक्ततया भूप कर्तव्यं कर्म जन्तुभिः॥ 'उसका अन्य प्राणियों में कोई साध्य (प्रयोजन) शेष नहीं रहता, अतएव हे राजन! लोगों को अपने-अपने कर्तव्य आसक्त बुद्धि से करते रहना चाहिए' गणेणगीता 2.18)। इन सब उदाहरणों पर ध्यान देने से ज्ञात होगा, कि यहाँ पर गीता के तीनों श्लोकों का जो कार्य-कारण-सम्बन्ध हमने ऊपर दिखलाया है, वही ठीक है। और, गीता के तीनों श्लोकों का पूरा अर्थ योगवासिष्ठ के एक ही श्लोक में आ गया है, अतएव उसके कार्य-कारण-भाव के विषय में शंका करने के लिए स्थान ही नहीं रह जाता। गीता की इन्हीं युक्तियों का महायानपन्थ के बौद्ध ग्रन्थकारों ने भी पीछे से ले लिया है (गी॰ र॰ पृ. 568 – 569)। ऊपर जो यह कहा गया है कि स्वार्थ न रहने के कारण से ही ज्ञानी पुरुष को अपना कर्तव्य निष्काम बुद्धि से करना चाहिए, और इस प्रकार से किए हुए निष्काम कर्म का मोक्ष में बाधक होना तो दूर रहा, उसी से सिद्धि मिलती है – इसी की पुष्टि के लिए अब दृष्टान्त देते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.१९