भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१ ·

English

मूल श्लोक

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yadyadācarati śreṣṭhastattadevetaro janaḥ sa yatpramāṇaṃ kurute lokastadanuvartate

३.२१अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक २१

अनुवाद

श्रेष्ठ (अर्थात् आत्मज्ञानी कर्मयोगी पुरुष) जो कुछ करता है, वही अन्य अर्थात् साधारण मनुष्य भी किया करते है। वह जिसे प्रमाण मानकर अंगीकार करता है लोग उसी का अनुकरण करते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

तैत्तिरीय उपनिषद् में भी पहले 'सत्यं वद,' 'धर्म चर' इत्यादि उपदेश किया है और फिर अन्त में कहा है कि 'जब संसार में तुम्हें सन्देह हो कि यहाँ कैसा बर्ताव करें, तब वैसा ही बर्ताव करो कि जैसा ज्ञानी, युक्त और धर्मिष्ठ ब्राह्मण करते हों।' (तै॰ 1.11.4)। इसी अर्थ का एक श्लोक नारायणीय धर्म में भी है (मभा॰ शां॰ 341.25); और इसी आशय का मराठी में एक श्लोक है जो इसी का अनुवाद है और जिसका सार यह है 'लोककल्याणकारी मनुष्य जैसा बर्ताव करता है वैसे ही, इस संसार में, सब लोग भी किया करते है।' यही भाव इस प्रकार प्रगट किया जा सकता है – 'देख भलों की चाल को बर्ते सब संसार।' यही लोककल्याणकारी पुरुष गीता का 'श्रेष्ठ' कर्मयोगी है। श्रेष्ठ शब्द का अर्थ 'आत्मज्ञानी संन्यासी' नहीं है (देखो गी॰ 5.2)। अब भगवान स्वयं अपना उदाहरण देकर इसी अर्थ को और भी दृढ़ करते है, कि आत्मज्ञानी पुरुष की स्वार्थबुद्धि छूट जाने पर भी, लोककल्याण के कर्म उससे छूट नहीं जाते –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.२१