भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५ ·

English

मूल श्लोक

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt svadharme nidhanaṃ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ

३.३५अध्याय ३ · कर्मयोग४३ में से श्लोक ३५

अनुवाद

पराये धर्म का आचरण सुख से करते बने तो भी उसकी अपेक्षा अपना धर्म अर्थात् चातुर्वर्ण्य-विहित कर्म ही अधिक श्रेयस्कर है; (फिर चाहे) वह विगुण अर्थात् सदोष भले ही हो। स्वधर्म के अनुसार (बर्तने में) मृत्यु हो जावे तो भी उसमें कल्याण है, (परन्तु) परधर्म भयंकर होता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

स्वधर्म वह व्यवसाय है कि जो स्मृतिकारों की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक मनुष्य को शास्त्र द्वारा नियत कर दिया गया है; स्वकर्म का अर्थ मोक्षधर्म नहीं है। सब लोगों के कल्याण के लिए ही गुण-धर्म के विभाग से चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को (गी॰ 18.41) शास्त्रकारों ने प्रवृत्त कर दिया है। अतएव भगवान कहते है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि ज्ञानी हो जाने पर भी अपना-अपना व्यवसाय करते रहें, इसी में उनका और समाज का कल्याण है, इस व्यवस्था में बारंबार गड़बड़ करना योग्य नहीं है (देखो गीतार॰ पृ. 334 और 445 -496)। 'तेली का काम तँबोली करें, दैव न मारे आपै मरे' इस प्रचलित लोकोक्ति का भावार्थ भी यही है। जहाँ चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था का चलन नहीं है वहाँ भी, सब को यही श्रेयस्कर जँचेगा कि जिसने सारी जिन्दगी फौजी महकमे में बिताई हो, उसे फिर काम पड़े तो उसको सिपाही का पेशा ही सुभीते का होगा, न कि दर्जी का रोजगार; और यही न्याय चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था के लिए भी उपयोगी है। यह प्रश्न भिन्न है कि चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था भली है या बुरी; और वह यहाँ उपस्थित भी नहीं होता। यह बात तो निर्विवाद है, कि समाज का समुचित धारण-पोषण होने के लिए खेती के ऐसे निरुपद्रवी और सौम्य व्यवसाय की ही भाँति अन्यान्य कर्म भी आवश्यक हैं। अतएव जहाँ एक बार किसी उद्योग को अंगीकार किया – फिर चाहे उसे चातुर्वर्ण्य-व्यवस्था के अनुसार स्वीकार करो या अपनी मर्जी से – कि वह धर्म हो गया। फिर किसी विशेष अवसर पर उसमें मीन-मेख निकाल कर, अपना कर्तव्यकर्म-छोड़ बैठना अच्छा नहीं है; आवश्यकता होने पर उसी व्यवसाय में ही मर जाना चाहिए। बस, यही इस श्लोक का भावार्थ है। कोई भी व्यापार या रोजगार हो, उसमें कुछ न कुछ दोष सहज ही निकाला जा सकता है (देखो गी॰ 18.48)। परन्तु इस नुक्ताचीनी के मारे अपना नियत कर्तव्य ही छोड़ देना कुछ धर्म नहीं है। महाभारत के ब्राह्मण-व्याध-संवाद मे और तुलाधार-जाजलि-संवाद में भी यही बतलाया गया है, एवं वहाँ के 35 वें श्लोक का पूर्वार्ध मनुस्मृति (10.97) में और गीता (18.47) में भी आया है। भगवान ने 33 वें श्लोक में कहा है कि 'इन्द्रियों को मारने का हठ नहीं चलता।' इस पर अब अर्जुन ने पूछा है कि इन्द्रियों को मारने का हठ क्यों नहीं चलता और मनुष्य अपनी मर्जी न होने पर भी बुरे कामों की ओर क्यों घसीटा जाता है?

— Lokmanya Tilak

अध्याय ३, श्लोक ३.३५