शिक्षाएँ
भक्ति
६ श्लोक
- श्लोक ९.२२अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिन्तन कर मुझे भजते है, उन नित्य योगयुक्त पुरुषों का योग-क्षेम मैं किया करता हूँ।
- श्लोक ९.२६पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥जो मुझे भक्ति से एक-आध पत्र, पुष्प, फल अथवा (यथाशक्ति ) थोड़ा-सा जल भी अर्पण करता है, उस प्रयतात्म अर्थात् नियतचित्त पुरुष की भक्ति की भेंट को मैं (आनन्द से) ग्रहण करता हूँ।
- श्लोक ९.३४मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥मुझमें मन लगा, मेरा भक्त हो, मेरी पूजा कर और मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मत्परायण होकर, योग का अभ्यास करने से मुझे ही पावेगा।
- श्लोक १२.८मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥(अतएव) मुझमें ही मन लगा, मुझमें बुद्धि को स्थिर कर, इससे तू निःसन्देह मुझमें ही निवास करेगा।
- श्लोक १८.६५मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥मुझमें अपना मन रख, मेरा भक्त हो, मेरा यजन कर और मेरी वन्दना कर, मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि (इससे) तू मुझमें ही आ मिलेगा, (क्योंकि ) तू मेरा प्यारा (भक्त) है।
- श्लोक १८.६६सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥सब धर्मों को छोड़ कर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा, डर मत।