भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ९.३४ ·

English

मूल श्लोक

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

manmanā bhava madbhakto madyājī māṃ namaskuru māmevaiṣyasi yuktvaivamātmānaṃ matparāyaṇaḥ

९.३४अध्याय ९ · राजविद्याराजगुह्ययोग३४ में से श्लोक ३४

अनुवाद

मुझमें मन लगा, मेरा भक्त हो, मेरी पूजा कर और मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मत्परायण होकर, योग का अभ्यास करने से मुझे ही पावेगा।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

वास्तव में इस उपदेश का आरम्भ 33 वें श्लोक में ही हो गया है। 33 वें श्लोक में 'अनित्य' पद अध्यात्मशास्त्र के इस सिद्धान्त के अनुसार आया है, कि प्रकृति का फैलाव अथवा नाम-रूपात्मक दृश्य-सृष्टि अनित्य है और एक परमात्मा ही नित्य है; और 'असुख' पद से इस सिद्धान्त का अनुवाद है, कि इस संसार में सुख की अपेक्षा दुःख अधिक है। तथापि यह वर्णन अध्यात्म का नहीं हैं, भक्तिमार्ग का है। अतएव भगवान ने परब्रह्म अथवा परमात्मा शब्द का प्रयोग न करके 'मुझे भज, मुझमें मन लगा, मुझे नमस्कार कर,' ऐसे व्यक्तस्वरूप के दर्शाने वाले प्रथम पुरुष का निर्देश किया है। भगवान का अन्तिम कथन है, कि हे अर्जुन! इस प्रकार भक्ति करके मत्परायण होता हुआ योग अर्थात् कर्मयोग का अभ्यास करता रहेगा तो (देखो गी॰ 7.1) तू कर्मबन्धन से मुक्त हो करके निःसन्देह मुझे पा लेगा। इसी उपदेश की पुनरावृत्ति ग्यारहवें अध्याय के अन्त में की गई है। गीता का रहस्य भी यही है। भेद इतनी ही है, कि उस रहस्य को एक बार अध्यात्मदृष्टि से और एक बार भक्तिदृष्टि से बतला दिया है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ९, श्लोक ९.३४