मूल श्लोक
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
ananyāścintayanto māṃ ye janāḥ paryupāsate teṣāṃ nityābhiyuktānāṃ yogakṣemaṃ vahāmyaham
अनुवाद
जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिन्तन कर मुझे भजते है, उन नित्य योगयुक्त पुरुषों का योग-क्षेम मैं किया करता हूँ।
टिप्पणी
जो वस्तु मिली नहीं है, उसको जुटाने का नाम है योग, और मिली हुई वस्तु की रक्षा करने है क्षेम। शाश्वतकोश में भी (देखो 100 और 292 श्लोक) योग-क्षेम की ऐसी ही व्याख्या है, और उसका पूरा अर्थ 'सांसारिक नित्य निर्वाह' है। गीतारहस्य के बारहवें प्रकरण (पृ. 383 – 384) में इसका विचार किया गया है, कि कर्मयोग-मार्ग में इस श्लोक का क्या अर्थ होता है। इसी प्रकार नारायणीय धर्म (मभा॰ शां॰ 248.72) में भी वर्णन है कि – मनीषिणो हि ये केचित् यतयो मोक्षधर्मिणः। तेषां विच्छिन्नतृष्णानां योगक्षेमवहो हरिः॥ ये पुरुष एकान्तभक्त हो तो भी प्रवृत्तिमार्ग के हैं, अर्थात् निष्काम-बुद्धि से कर्म किया करते है। अब बतलाते है, कि परमेश्वर की बहुत्व से सेवा करनेवालों की अन्त में कौन गति होती है –
— Lokmanya Tilak