मूल श्लोक
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ
अनुवाद
(अतएव) मुझमें ही मन लगा, मुझमें बुद्धि को स्थिर कर, इससे तू निःसन्देह मुझमें ही निवास करेगा।
टिप्पणी
इसमें भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है। दूसरे श्लोक में पहले यह सिद्धान्त किया है, कि भगवद्भक्त उत्तम योगी है; फिर तीसरे श्लोक में पक्षान्तर-बोधक 'तु' अव्यय का प्रयोग कर, इसमें और चौथे श्लोक में कहा है, कि अव्यक्त की उपासना करनेवाले भी मुझे ही पाते है। परन्तु इसके सत्य होने पर भी पाँचवें श्लोक में यह बतलाया है, कि अव्यक्त उपासकों का मार्ग अधिक क्लेशदायक होता है; छटे और सातवें श्लोक में वर्णन किया है, कि अव्यक्त की अपेक्षा अव्यक्त की उपासना सुलभ होती है; और आठवें श्लोक में इसके अनुसार व्यवहार करने का अर्जुन को उपदेश किया है। सारांश, ग्यारहवें अध्याय के अन्त (गी॰ 11.55) में जो उपदेश कर आए है, यहाँ अर्जुन के प्रश्न करने पर उसी को दृढ़ कर दिया है। इसका विस्तारपूर्वक विचार, कि भक्तिमार्ग में सुलभता क्या है, गीतारहस्य के तेरहवें प्रकरण में कर चुके है; इस कारण यहाँ हम उसकी पुनरुक्ति नहीं करते। इतना ही कह देते है, कि अव्यक्त की उपासना कष्टमय होने पर भी मोक्षदायक ही है; और भक्तिमार्ग वालों को स्मरण रखना चाहिए, कि भक्तिमार्ग में भी कर्म न छोड़ कर ईश्वरार्पण अवश्य करना पड़ता है। इसी हेतु से छठे श्लोक में 'मुझे ही सब कर्मों का संन्यास करके' ये शब्द रखे गए हैं। इसका स्पष्ट अर्थ यह है, कि भक्तिमार्ग में भी कर्मों को स्वरूपतः न छोड़े, किन्तु परमेश्वर में उन्हें अर्थात् उनके फलों को अर्पण कर दे। इससे प्रगट होता है, कि भगवान ने इस अध्याय के अन्त में जिस भक्ति मान् पुरुष को अपना प्यारा बतलाया है, उसे भी इसी अर्थात् निष्काम कर्मयोग-मार्ग का ही समझना चाहिए; यह स्वरूपतः कर्मसंन्यासी नहीं है। इस प्रकार भक्तिमार्ग की श्रेष्ठता और सुलभता बतला कर अब परमेश्वर में ऐसी भक्ति करने के उपाय अथवा साधन बतलाते हुए, उनके तारतम्य का भी खुलासा करते हैं –
— Lokmanya Tilak