मूल श्लोक
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yo me bhaktyā prayacchati tadahaṃ bhaktyupahṛtamaśnāmi prayatātmanaḥ
अनुवाद
जो मुझे भक्ति से एक-आध पत्र, पुष्प, फल अथवा (यथाशक्ति ) थोड़ा-सा जल भी अर्पण करता है, उस प्रयतात्म अर्थात् नियतचित्त पुरुष की भक्ति की भेंट को मैं (आनन्द से) ग्रहण करता हूँ।
टिप्पणी
कर्म की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है (गी॰ 2.49) – यह कर्मयोग का तत्त्व हैं; उसका जो रूपान्तर भक्तिमार्ग में हो जाता है, उसी का वर्णन उक्त श्लोक में है (देखो गीतार॰ पृ. 473 – 475)। इस विषय में सुदामा के तन्दुलों की बात प्रसिद्ध है और यह श्लोक भागवतपुराण में, सुदामा-चरित के उपाख्यान में भी आया है (भाग॰ 10 उ॰ 81.4)। इसमें सन्देह नहीं, कि पूजा के द्रव्य अथवा सामग्री का न्यूनाधिक होना सर्वथा और सर्वदा मनुष्य के हाथ में नहीं भी रहता। इसी से शास्त्र में कहा है, कि यथाशक्ति प्राप्त होनेवाले स्वल्प पूजाद्रव्य से ही नहीं, प्रत्युत शुद्ध भाव से समर्पण किए हुए मानसिक पूजाद्रव्यों से भी भगवान सन्तुष्ट हो जाते है। देवता भाव का भूखा है, न कि पूजा की सामग्री का। मीमांसक-मार्ग क अपेक्षा भक्तिमार्ग में जो कुछ विशेषता है, वह यही है। यज्ञ-याग करने लिए बहुत-सी सामग्री जुटानी पड़ती हैं और उद्योग भी बहुत करना पड़ता है, परन्तु भक्ति यज्ञ एक तुलसीदल से भी हो जाता है। महाभारत में कथा है कि जब दुर्वासऋषि घर पर आए, तब द्रौपदी ने इसी प्रकार के यज्ञ से भगवान को सन्तुष्ट किया था। भगवद्भक्त जिस प्रकार अपने कर्म करता है, अर्जुन को उसी प्रकार करने का उपदेश देकर बतलाते है, कि इससे क्या फल मिलता है –
— Lokmanya Tilak