शिक्षाएँ
सद्गुण
५ श्लोक
- श्लोक १२.१३अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥जो किसी से द्वेष नहीं करता, जो सब भूतों के साथ मित्रता से बर्ता है, जो कृपालु है, जो ममत्वबुद्धि और अहंकार से रहित है जो दुःख और सुख में समान एवं क्षमाशील है,
- श्लोक १२.१५यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः । हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥जिससे न तो लोगों को क्लेश होता है और न जो लोगों से क्लेश पाता है, ऐसे ही जो हर्ष, क्रोध, भय और विषाद से अलिप्त है, वही मुझे प्रिय है।
- श्लोक १६.१श्रीभगवानुवाच । अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः । दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥श्रीभगवान ने कहा: अभय (निडर), शुद्ध सात्त्विक वृत्ति, ज्ञान-योग व्यवस्थिति अर्थात् ज्ञान (-मार्ग) और (कर्म-) योग की तारतम्य से व्यवस्था, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय अर्थात् स्वधर्म के अनुसार आचरण, तप, सरलता,
- श्लोक १६.२अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् । दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥अहिंसा, सत्य, अक्रोध, कर्मफल का त्याग, शान्ति , अपैशुन्य अर्थात् क्षुद्र-दृष्टि छोड़कर उदार भाव रखना, सब भूतों में दया, तृष्णा न रखना, मृदुता, (बुरे काम की) लाज, अचपलता अर्थात् फिजूल कामों का छूट जाता,
- श्लोक १६.३तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता । भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥तेजस्विता, क्षमा, धृति, शुद्धता, द्रोह न करना, अतिमान न रखना – हे भारत! (ये) गुण दैवी, सम्पत्ति में जन्मे हुए पुरुषों को प्राप्त होते है।