मूल श्लोक
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata
अनुवाद
तेजस्विता, क्षमा, धृति, शुद्धता, द्रोह न करना, अतिमान न रखना – हे भारत! (ये) गुण दैवी, सम्पत्ति में जन्मे हुए पुरुषों को प्राप्त होते है।
टिप्पणी
दैवी सम्पत्ति के ये छब्बीस गुण और तेरहवें अध्याय में बतलाए हुए ज्ञान के बीस लक्षण (गी॰ 13.7 – 11) वास्तव में एक ही हैं; और इसी से आगे के श्लोक में 'अज्ञान' का समावेश आसुरी लक्षणों में किया गया है। यह नहीं कहा जा सकता, कि छब्बीस गुणों की फेहरिस्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ दूसरे शब्द के अर्थ से सर्वथा भिन्न होगा; और हेतु भी ऐसा नहीं है। उदाहरणार्थ, कोई-कोई अहिंसा के ही कायिक, वाचिक और मानसिक भेद करके क्रोध से किसी के दिल दुखा देने को भी एक प्रकार की हिंसा ही समझते हैं। इसी प्रकार शुद्धता को भी विविध मान लेने से, मन की शुद्धि में अक्रोध और द्रोह न करना आदि गुण भी आ सकते हैं। महाभारत के शान्तिपर्व में 160 अध्याय से लेकर 163 अध्याय तक क्रम, अहिंसा, सत्य, आर्जव और लज्जा आदि पच्चीस तीस गुणों का, व्यापक अर्थ में समावेश किया गया है (शां॰ 160) और सत्य के निरूपण (शां॰ 162) में कहा है कि सत्य, समता, दम, अमात्सर्थ, क्षमा, लज्जा, तितिक्षा, अनसूयता, याग, ध्यान, आर्यता (लोक-कल्याण की इच्छा) धृति और दया, इन तेरह गुणों का एक सत्य में ही समावेश होता है; और वहीं इन शब्दों की व्याख्या भी कर दी गई है। इस रीति से एक ही गुण में अनेकों का समावेश कर लेना पाण्डित्य का काम है, और ऐसा विवेचन करने लगें, तो प्रत्येक गुण पर एक-एक ग्रन्थ लिखना पड़ेगा। ऊपर के श्लोकों में इन सब गुणों का समुच्चय इसी लिए बतलाया गया है, कि जिसमें दैवी सम्पत्ति के सात्त्विक रूप की पूरी कल्पना हो जावे और यदि एक शब्द में कोई अर्थ छूट गया हो तो दूसरे शब्द में उसका समावेश हो जावे। अस्तु; ऊपर की फेहरिस्त के 'ज्ञानयोग-व्यवस्थिति' शब्द का अर्थ हमने गीता 4.41 और 42 वें श्लोक के आधार पर कर्मयोग-प्रधान किया है। त्याग और धृति की व्याख्या स्वयं भगवान ने ही 18 वें अध्याय में कर दी है (18.4 और 29)। यह बतला चुके कि दैवी सम्पत्ति में किन गुणों का समावेश होता है; अब इसके विपरीत आसुरी या राक्षसी सम्पत्ति का वर्णन करते हैं –
— Lokmanya Tilak