शिक्षाएँ
मन पर विजय
६ श्लोक
- श्लोक २.५८यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥जिस प्रकार कछुवा अपने (हाथ-पैर आदि) अवयव सब ओर से सिकोड़ लेता है, उसी प्रकार जब कोई पुरुष इन्द्रियों के (शब्द, स्पर्श आदि) विषयों से (अपनी) इन्द्रियों को खींच लेता है, तब (कहना चाहिए कि ) उसकी बुद्धि स्थिर हुई।
- श्लोक ६.५उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥(मनुष्य) अपना उद्धार आप ही करें। अपने आप को (कभी भी) गिरने न दे। क्योंकि (प्रत्येक मनुष्य) स्वयं ही अपना बन्धु (अर्थात् सहायक), या स्वयं अपना शत्रु है।
- श्लोक ६.६बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥जिसने अपने आप को जीत लिया, वह स्वयं अपना बन्धु है, परन्तु जो अपने आप को नहीं पहचानता, वह स्वयं अपने साथ शत्रु के समान बैर करता है।
- श्लोक ६.२६यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥(इस रीति से चित्त को एकाग्र करते हुए) चंचल और स्थिर मन जहाँ-जहाँ बाहर जावे, वहाँ-वहाँ से रोक कर उसको आत्मा के ही स्वाधीन करें।
- श्लोक ६.३४चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् । तस्याऽहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥क्योंकि हे कृष्ण! यह मन चंचल, हठीला, बलवान और दृढ़ है। वायु के समान (अर्थात् हवा की गठरी बाँधने के समान) इसका निग्रह करना मुझे अत्यन्त दुष्कर दिखता है।
- श्लोक ६.३५श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहु अर्जुन! इसमें सन्देह नहीं कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है; परन्तु हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से वह स्वाधीन किया जा सकता है।