भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३४ ·

English

मूल श्लोक

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्‌ दृढम् ।तस्याऽहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

cañcalaṃ hi manaḥ kṛṣṇa pramāthi balavad dṛḍham tasyā'haṃ nigrahaṃ manye vāyoriva suduṣkaram

६.३४अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ३४

अनुवाद

क्योंकि हे कृष्ण! यह मन चंचल, हठीला, बलवान और दृढ़ है। वायु के समान (अर्थात् हवा की गठरी बाँधने के समान) इसका निग्रह करना मुझे अत्यन्त दुष्कर दिखता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

33 वें श्लोक के 'साम्य' अथवा 'साम्यबुद्धि' से प्राप्त होनेवाला, इस विशेषण से यहाँ योग शब्द का कर्मयोग ही अर्थ है। यद्यपि पहले पातंजल-योग की समाधि का वर्णन आया है, तो भी इस श्लोक में 'योग' शब्द से पातंजलयोग विवक्षित नहीं है। क्योंकि दूसरे अध्याय में भगवान ने ही कर्मयोग की ऐसी व्याख्या की है, 'समत्व योग उच्यते' (2.48) – 'बुद्धि की समता या समत्व को ही योग कहते है।' अर्जुन की कठिनाई को मान कर भगवान कहते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.३४