मूल श्लोक
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yato yato niścarati manaścañcalamasthiram tatastato niyamyaitadātmanyeva vaśaṃ nayet
अनुवाद
(इस रीति से चित्त को एकाग्र करते हुए) चंचल और स्थिर मन जहाँ-जहाँ बाहर जावे, वहाँ-वहाँ से रोक कर उसको आत्मा के ही स्वाधीन करें।
टिप्पणी
मन की समाधि लगाने की क्रिया का यह वर्णन कठोपनिषद् में दी गई रथ की उपमा से (कठ॰ 1.3.3) अच्छा व्यक्त होता है। जिस प्रकार उत्तम सारथी रथ के घोड़ों को इधर-उधर न जाने दे कर सीधे रास्ते से ले जाता है उसी प्रकार का प्रयत्न मनुष्य को समाधि के लिए करना पड़ता है। जिसने किसी भी विषय पर अपने मन को स्थिर कर लेने का अभ्यास किया है, उसकी समझ में ऊपरवाले श्लोक का मर्म तुरन्त आ जावेगा। मन को एक ओर से रोकने का प्रयत्न करने लगें, तो वह दूसरी ओर खि सक जाता है; और वह आदत रुके बिना समाधि लग नहीं सकती। अब, योगाभ्यास से चित्त स्थिर होने का जो फल मिलता है, उसका वर्णन करते है –
— Lokmanya Tilak