मूल श्लोक
श्रीभगवानुवाच ।असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
śrībhagavānuvāca asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate
अनुवाद
श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहु अर्जुन! इसमें सन्देह नहीं कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है; परन्तु हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से वह स्वाधीन किया जा सकता है।