भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३५ ·

English

मूल श्लोक

श्रीभगवानुवाच ।असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

śrībhagavānuvāca asaṃśayaṃ mahābāho mano durnigrahaṃ calam abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate

६.३५अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ३५

अनुवाद

श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहु अर्जुन! इसमें सन्देह नहीं कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है; परन्तु हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से वह स्वाधीन किया जा सकता है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.३५