शिक्षाएँ
ईश्वर
६ श्लोक
- श्लोक ४.७यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥हे भारत! जब-जब धर्म की ग्लानि होती और अधर्म की प्रबलता फैल जाती है; तब (तब) मैं स्वयं ही जन्म (अवतार) लिया करता हूँ।
- श्लोक ४.८परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥साधुओं की संरक्षा के निमित्त और दुष्टों का नाश करने के लिए, युग-युग में धर्म की संस्थापना के अर्थ मैं जन्म लिया करता हूँ।
- श्लोक १०.८अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते । इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥यह जान कर, कि मैं सब का उत्पत्तिस्थान हूँ और मुझसे सब वस्तुओं की प्रवृत्ति होती है, ज्ञानी पुरुष भावयुक्त होते हुए मुझको भजते हैं।
- श्लोक १०.२०अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः । अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥हे गुडाकेश! सब भूतों के भीतर रहनेवाला आत्मा मैं हूँ, और सब भूतों का आदि, मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।
- श्लोक १५.१५सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥इसी प्रकार मैं सब के हृदय में अधिष्ठित हूँ; स्मृति और ज्ञान एवं अपोहन अर्थात् उनका नाश मुझ में ही होती है; तथा सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ। वेदान्त का कर्ता और वेद जानने वाला भी मैं ही हूँ।
- श्लोक १८.६१ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥हे अर्जुन! ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रह कर (अपनी) माया से प्राणिमात्र को (ऐसे) घुमा रहा है मानो सभी (किसी) यन्त्र पर चढ़ाए गए हों।