मूल श्लोक
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ ca vedaiśca sarvairahameva vedyo vedāntakṛdvedavideva cāham
अनुवाद
इसी प्रकार मैं सब के हृदय में अधिष्ठित हूँ; स्मृति और ज्ञान एवं अपोहन अर्थात् उनका नाश मुझ में ही होती है; तथा सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ। वेदान्त का कर्ता और वेद जानने वाला भी मैं ही हूँ।
टिप्पणी
इस श्लोक का दूसरा चरण कैवल्य उपनिषद (2.3) में है। उसमें 'वेदैश्व सर्वैः' के स्थान में 'वेदैरनेकैः' इतना ही पाठभेद है। तब जिन्होंने गीता-काल में 'वेदान्त' शब्द का प्रचलित होना न मान कर ऐसी दलीलें की हैं, कि या तो श्लोक ही प्रक्षिप्त होगा या इसके 'वेदान्त' शब्द का कुछ और ही अर्थ लेना चाहिए, वे सब दलीलें बे-जड़-बुनियाद की हो जाती है। 'वेदान्त' शब्द मुण्डक (3.2.6) और श्वेताश्वतर के तो कुछ मन्त्र ही गीता में हूबहू आ गए हैं। अब निरुक्ति पूर्वक पुरुषोत्तम का लक्षण बतलाते हैं –
— Lokmanya Tilak