भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १५.१५ ·

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मूल श्लोक

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ ca vedaiśca sarvairahameva vedyo vedāntakṛdvedavideva cāham

१५.१५अध्याय १५ · पुरुषोत्तमयोग२० में से श्लोक १५

अनुवाद

इसी प्रकार मैं सब के हृदय में अधिष्ठित हूँ; स्मृति और ज्ञान एवं अपोहन अर्थात् उनका नाश मुझ में ही होती है; तथा सब वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ। वेदान्त का कर्ता और वेद जानने वाला भी मैं ही हूँ।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस श्लोक का दूसरा चरण कैवल्य उपनिषद (2.3) में है। उसमें 'वेदैश्व सर्वैः' के स्थान में 'वेदैरनेकैः' इतना ही पाठभेद है। तब जिन्होंने गीता-काल में 'वेदान्त' शब्द का प्रचलित होना न मान कर ऐसी दलीलें की हैं, कि या तो श्लोक ही प्रक्षिप्त होगा या इसके 'वेदान्त' शब्द का कुछ और ही अर्थ लेना चाहिए, वे सब दलीलें बे-जड़-बुनियाद की हो जाती है। 'वेदान्त' शब्द मुण्डक (3.2.6) और श्वेताश्वतर के तो कुछ मन्त्र ही गीता में हूबहू आ गए हैं। अब निरुक्ति पूर्वक पुरुषोत्तम का लक्षण बतलाते हैं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १५, श्लोक १५.१५