शिक्षाएँ
ज्ञान
४ श्लोक
- श्लोक ४.३४तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया । उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ध्यान में रख, कि प्रणिपात से, प्रश्न करने से और सेवा से तत्त्ववेत्ता ज्ञानी पुरुष तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे;
- श्लोक ४.३८न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र सचमुच और कुछ भी नहीं है। काल पाकर उस ज्ञान को वह पुरुष आप ही अपने में प्राप्त कर लेता है, जिसका योग अर्थात् कर्मयोग सिद्ध हो गया है।
- श्लोक ४.३९श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥जो श्रद्धावान पुरुष इन्द्रियसंयम करके उसी के पीछे पड़ा रहे, उसे (भी) यह ज्ञान मिल जाता है, और ज्ञान प्राप्त हो जाने से तुरन्त ही उसे परम शान्ति प्राप्त होती है।
- श्लोक १८.६३इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया । विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥इस प्रकार मैंने यह गुह्य से भी गुह्य ज्ञान तुझसे कहा है। इसका पूर्ण विचार करके जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर।