मूल श्लोक
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
na hi jñānena sadṛśaṃ pavitramiha vidyate tatsvayaṃ yogasaṃsiddhaḥ kālenātmani vindati
अनुवाद
इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र सचमुच और कुछ भी नहीं है। काल पाकर उस ज्ञान को वह पुरुष आप ही अपने में प्राप्त कर लेता है, जिसका योग अर्थात् कर्मयोग सिद्ध हो गया है।
टिप्पणी
37 वें श्लोक में 'कर्मों' का अर्थ 'कर्म का बन्धन' है (गी॰ 4.18 देखो)। अपनी बुद्धि से आरम्भ किए हुए निष्काम कर्मों के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति कर लेना ज्ञान की प्राप्ति का मुख्य या बुद्धिगम्य मार्ग है। परन्तु जो स्वयं इस प्रकार अपनी बुद्धि से ज्ञान को प्राप्त न कर सके, उसके लिए अब श्रद्धा का दूसरा मार्ग बतलाते हैं –
— Lokmanya Tilak