भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १८.६३ ·

English

मूल श्लोक

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया ।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru

१८.६३अध्याय १८ · मोक्षसंन्यासयोग७८ में से श्लोक ६३

अनुवाद

इस प्रकार मैंने यह गुह्य से भी गुह्य ज्ञान तुझसे कहा है। इसका पूर्ण विचार करके जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इन श्लोकों में कर्म-पराधीनता का जो गूढ़ तत्त्व बतलाया गया है उसका विचार गीतारहस्य के 10 वें प्रकरण में विस्तारपूर्वक हो चुका है। यद्यपि आत्मा स्वयं स्वतन्त्र है, तथापि जगत के अर्थात् प्रकृति के व्यवहार को देखने से मालूम होता है, कि उस कर्म के चक्र पर आत्मा का कुछ भी अधिकार नहीं है कि जो अनादि काल से चल रहा है। जिनकी हम इच्छा नहीं करते. बल्कि जो हमारी इच्छा के विपरीत भी हैं, ऐसी सैकड़ों – हजारों बातें संसार में हुआ करती हैं; तथा उनके व्यापार भी हम पर होते रहते हैं, अथवा उक्त व्यापारों का ही कुछ भाग हमें करना पड़ता है; यदि इनकार करते है तो बनता नहीं है। ऐसे अवसर पर ज्ञानी मनुष्य अपनी बुद्धि को निर्मल रख कर और सुख या दुःख को एक समझ कर सब कर्म किया करता है; किन्तु मूर्ख मनुष्य उनके फन्दे में फँस जाता है। इन दोनों के आचरण में यही महत्त्वपूर्ण भेद है। भगवान ने तीसरे ही अध्याय में कह दिया है कि 'सभी प्राणी अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार चलते रहते है, वहाँ निग्रह क्या करेगा?' (गी॰ 3.33)। ऐसी स्थिति में मोक्षशास्त्र अथवा नीतिशास्त्र इतना उपदेश कर सकता है, कि कर्म में आसक्ति मत रखो। इससे अधिक वह कुछ नहीं कह सकता। यह अध्यात्म-दृष्टि से विचार हुआ; परन्तु भक्ति की दृष्ट से प्रकृति भी तो ईश्वर का ही अंश है। अतः यही सिद्धान्त 61 वें और 62 वें श्लोक में ईश्वर को सारा कर्तृत्व सौंप कर बतलाया गया है। जगत में जो कुछ व्यवहार हो रहे हैं, उन्हें परमेश्वर जैसे चाहता है वैसे करता रहा है। इसलिए ज्ञानी मनुष्य को उचित है, कि अहंकार-बुद्धि छोड़ कर अपने आप को सर्वथा परमेश्वर के ही हवाले कर दे। 63 वें श्लोक में भगवान ने कहा है सही कि 'जैसी तेरी इच्छा हो, वैसा कर,' परन्तु उसका अर्थ बहुत गम्भीर है। ज्ञान अथवा भक्ति के द्वारा जहाँ बुद्धि साम्यावस्था में पहुँची, वहाँ फिर बुरी इच्छा बचने ही नहीं पाती। अतएव ऐसे ज्ञानी पुरुष का 'इच्छा स्वातन्त्र्य' (इच्छा का स्वाधीनता) उसे अथवा जगत को कभी अहितकारक नहीं हो सकता। इसलिए उक्त श्लोक का ठीक-ठीक भावार्थ यह है कि 'ज्यों ही तू इस ज्ञान को समझ लेगा (विमृश्य), त्यों ही तू स्वयंप्रकाश हो जाएगा; और फिर (पहले से नहीं) तू अपनी इच्छा से जो कर्म करेगा, वही धर्म्य एवं प्रमाण होगा; तथा स्थितप्रज्ञ की ऐसी अवस्था प्राप्त हो जाने पर तेरी इच्छा को रोकने की आवश्यकता ही न रहेगी।' अस्तु; गीतारहस्य के 14 वें प्रकरण में हम दिखला चुके है कि गीता में ज्ञान की अपेक्षा भक्ति को ही अधिक महत्त्व दिया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार अब सम्पूर्ण गीताशास्त्र का भक्तिप्रधान उपसंहार करते है–

— Lokmanya Tilak

अध्याय १८, श्लोक १८.६३