शिक्षाएँ
अनासक्ति
५ श्लोक
- श्लोक २.३८सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥सुख-दुःख, नफा-नुकसान और जय-पराजय को एक-सा मान कर फिर युद्ध में लग जा। ऐसा करने से तुझे (कोई भी) पाप लगने का नहीं।
- श्लोक २.४८योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥हे धनंजय! आसक्ति छोड़कर और कर्म की सिद्धि हो या असिद्धि, दोनों को समान ही मानकर, 'योगस्थ' होकर कर्म कर, (कर्म के सिद्ध होने या निष्फल होने में रहने वाली) समता की (मनो-) वृत्ति को ही (कर्म-) योग कहते है।
- श्लोक २.७०आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥चारों ओर से (पानी) भरते जाने पर भी जिसकी मर्यादा नहीं डिगती, ऐसे समुद्र में जिस प्रकार सब पानी चला जाता है, उसी प्रकार जिस पुरुष में समस्त विषय (उसकी शान्ति भंग हुए बिना ही) प्रवेश करते है, उसे ही (सच्ची) शान्ति मिलती है। विषयों की इच्छा करनेवाले को (यह शान्ति ) नहीं ( मिलती)।
- श्लोक ३.१९तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥तस्मात् अर्थात् जब ज्ञानी पुरुष इस प्रकार कोई भी अपेक्षा नहीं रखता तब, तू भी (फल की) आसक्ति छोड़कर अपना कर्तव्यकर्म सदैव किया कर; क्योंकि आसक्ति छोड़कर कर्म करनेवाले मनुष्य को परमगति प्राप्त होती है।
- श्लोक ५.१०ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥जो ब्रह्म में अर्पण कर आसक्ति -विरहित कर्म करता है, उसको वैसे ही पाप नहीं लगता, जैसे कि कमल के पत्ते को पानी नहीं लगता।