भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.३८ ·

English

मूल श्लोक

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi

२.३८अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ३८

अनुवाद

सुख-दुःख, नफा-नुकसान और जय-पराजय को एक-सा मान कर फिर युद्ध में लग जा। ऐसा करने से तुझे (कोई भी) पाप लगने का नहीं।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

संसार में आयु बिताने के दो मार्ग है – एक सांख्य और दूसरा योग। इनमें जिस सांख्य अथवा संन्यासमार्ग के आचार को ध्यान में लाकर अर्जुन युद्ध छोड़कर भिक्षा माँगने के लिए तैयार हुआ था, उस संन्यास-मार्ग के तत्त्व-ज्ञानानुसार ही आत्मा का या देह का शोक करना उचित नहीं है। भगवान ने अर्जुन को सिद्ध कर दिखलाया है कि सुख और दुःखों को समबुद्धि से सह लेना चाहिए एवं स्वधर्म की ओर ध्यान देकर युद्ध करना ही क्षत्रिय को उचित है, तथा समबुद्धि से युद्ध करने में कोई भी पाप नहीं लगता। परन्तु इस मार्ग (सांख्य) का मत है कि कभी न कभी संसार छोड़कर संन्यास ले लेना ही प्रत्येक मनुष्य का इस जगत में परम कर्तव्य है; इसलिए इष्ट जान पड़े तो अभी ही युद्ध छोड़कर संन्यास क्यों न ले लें, अथवा स्वधर्म का पालन ही क्यों करें, इत्यादि शंकाओं का निवारण सांख्यज्ञान से नहीं होता और इसी से यह कह सकते है कि अर्जुन का मूल आक्षेप ज्यों का त्यों बना है। अतएव अब भगवान कहते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.३८