मूल श्लोक
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate
अनुवाद
हे धनंजय! आसक्ति छोड़कर और कर्म की सिद्धि हो या असिद्धि, दोनों को समान ही मानकर, 'योगस्थ' होकर कर्म कर, (कर्म के सिद्ध होने या निष्फल होने में रहने वाली) समता की (मनो-) वृत्ति को ही (कर्म-) योग कहते है।