जब मन हो
चिंता में
६ श्लोक
- श्लोक २.१४मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥हे कुन्तीपुत्र! शीतोष्ण या सुख-दुःख देनेवाले, मात्राओं अर्थात् बाह्य सृष्टि के पदार्थों के (इन्द्रियों से) जो संयोग हैं, उनकी उत्पत्ति होती है और नाश होता है; (अतएव) वे अनित्य अर्थात् नाशवान हैं। हे भारत! (शोक न करके) उनको तू सहन कर।
- श्लोक २.४७कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥कर्म करने मात्र का तेरा अधिकार है; फल (मिलना या न मिलना) कभी भी तेरे अधिकार अर्थात् ताबे में नहीं; (इसलिए मेरे कर्म का) अमुक फल मिले, यह हेतु (मन में) रखकर काम करनेवाला न हो, और कर्म न करने का भी तू आग्रह न कर।
- श्लोक २.५६दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः । वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥दुःख में जिसके मन को खेद नहीं होता, सुख में जिसकी आसक्ति नहीं और प्रीति, भय एवं क्रोध जिसके छूट गए हैं, उसको स्थितप्रज्ञ मुनि कहते है।
- श्लोक ६.३५श्रीभगवानुवाच । असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥श्रीभगवान ने कहा: हे महाबाहु अर्जुन! इसमें सन्देह नहीं कि मन चंचल है और उसका निग्रह करना कठिन है; परन्तु हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से वह स्वाधीन किया जा सकता है।
- श्लोक ९.२२अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते । तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥जो अनन्यनिष्ठ लोग मेरा चिन्तन कर मुझे भजते है, उन नित्य योगयुक्त पुरुषों का योग-क्षेम मैं किया करता हूँ।
- श्लोक १८.६६सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥सब धर्मों को छोड़ कर तू केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त करूँगा, डर मत।