जब मन हो
भय में
५ श्लोक
- श्लोक २.२०न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥यह (आत्मा) न तो कभी जन्मता है और न मरता ही है; ऐसा भी नहीं है कि यह (एक बार) होकर फिर होने का नहीं है; यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, एवं शरीर का वध हो जाएँ तो भी मारा नहीं जाता।
- श्लोक २.४०नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते । स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग में (एक बार) आरम्भ किए हुए कर्म का नाश नहीं होता और (आगे) विघ्न भी नहीं होते। इस धर्म का थोड़ा-सा भी (आचरण) बड़े भय से संरक्षण करता है।
- श्लोक ४.१०वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥प्रीति, भय और क्रोध से छूटे हुए, मत्परायण और मेरे आश्रय में आए हुए अनेक लोग (इस प्रकार) ज्ञानरूप तप से शुद्ध होकर मेरे स्वरूप में आकर मिल गए है।
- श्लोक ६.४०श्रीभगवानुवाच । पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥श्रीभगवान ने कहा: हे पार्थ! क्या इस लोक में और क्या परलोक में ऐसे पुरुष का कभी विनाश होता नहीं। क्योंकि हे तात! कल्याणकारक कर्म करनेवाले किसी भी पुरुष की दुर्गति नहीं होती।
- श्लोक ९.३१क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति । कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥वह जल्दी धर्मात्मा हो जाता है और नित्य शान्ति पाता है। हे कौन्तेय! तू खूब समझ रह, कि मेरा भक्त (कभी भी) नष्ट नहीं होता।