मूल श्लोक
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt
अनुवाद
यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग में (एक बार) आरम्भ किए हुए कर्म का नाश नहीं होता और (आगे) विघ्न भी नहीं होते। इस धर्म का थोड़ा-सा भी (आचरण) बड़े भय से संरक्षण करता है।
टिप्पणी
इस सिद्धान्त का महत्त्व गीतारहस्य के दसवें प्रकरण ( पृ 284) में दिखलाया गया है, और अधिक खुलासा आगे गीता में भी किया गया है (गी, 6.40 – 46)। इसका यह अर्थ है कि कर्मयोगमार्ग में यदि एक जन्म में सिद्धि न मिले, तो किया हुआ कर्म व्यर्थ न जा कर अगले जन्म में उपयोगी होता है और प्रत्येक जन्म में इसकी बढ़ती होती है एवं अन्त में कभी न कभी सच्ची सद्गति मिलती ही है। अब कर्मयोगमार्ग का दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बतलाते है –
— Lokmanya Tilak