भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.४० ·

English

मूल श्लोक

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

२.४०अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ४०

अनुवाद

यहाँ अर्थात् इस कर्मयोग में (एक बार) आरम्भ किए हुए कर्म का नाश नहीं होता और (आगे) विघ्न भी नहीं होते। इस धर्म का थोड़ा-सा भी (आचरण) बड़े भय से संरक्षण करता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

इस सिद्धान्त का महत्त्व गीतारहस्य के दसवें प्रकरण ( पृ 284) में दिखलाया गया है, और अधिक खुलासा आगे गीता में भी किया गया है (गी, 6.40 – 46)। इसका यह अर्थ है कि कर्मयोगमार्ग में यदि एक जन्म में सिद्धि न मिले, तो किया हुआ कर्म व्यर्थ न जा कर अगले जन्म में उपयोगी होता है और प्रत्येक जन्म में इसकी बढ़ती होती है एवं अन्त में कभी न कभी सच्ची सद्गति मिलती ही है। अब कर्मयोगमार्ग का दूसरा महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.४०