भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ४.१० ·

English

मूल श्लोक

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vītarāgabhayakrodhā manmayā māmupāśritāḥ bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥ

४.१०अध्याय ४ · ज्ञानविभागयोग४२ में से श्लोक १०

अनुवाद

प्रीति, भय और क्रोध से छूटे हुए, मत्परायण और मेरे आश्रय में आए हुए अनेक लोग (इस प्रकार) ज्ञानरूप तप से शुद्ध होकर मेरे स्वरूप में आकर मिल गए है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

भगवान के दिव्य जन्म को समझने के लिए यह जानना पड़ता है कि अव्यक्त परमेश्वर माया से सगुण कैसे होता है; और इसके जान लेने से अध्यात्मज्ञान हो जाता है एवं दिव्य कर्म को जान लेने पर कर्म करके भी अलिप्त रहने का, अर्थात् निष्काम कर्म के तत्त्व का ज्ञान हो जाता है। सारांश, परमेश्वर के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म को पूरा-पूरा जान लें तो अध्यात्मज्ञान और कर्मयोग दोनों की पूरी-पूरी पहचान हो जाती है, और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इसकी आवश्यकता होने के कारण ऐसे मनुष्य को अन्त में भगवत्प्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। अर्थात् भगवान के दिव्य जन्म और दिव्य कर्म जान लेने से सब कुछ आ गया; फिर अध्यात्मज्ञान अथवा निष्काम कर्मयोग दोनों का अलग-अलग अध्ययन नहीं करना पड़ता। अतएव वक्तव्य यह है कि भगवान के जन्म और कृत्य का विचार करो, एवं उसके तत्त्व को परख कर बर्ताव करो; भगवत्प्राप्ति होने के लिए दूसरा कोई साधन अपेक्षित नहीं है। भगवान की यही सच्ची उपासना है। अब इसकी अपेक्षा नीचे के दर्जे की उपासनाओं के फल और उपयोग बतलाते है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ४, श्लोक ४.१०