शिक्षाएँ
अमर आत्मा
५ श्लोक
- श्लोक २.१३देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥जिस प्रकार देह धारण करनेवाले को इस देह में बालपन, जवानी और बुढ़ापा प्राप्त होता है, उसी प्रकार (आगे) दूसरी देह प्राप्त हुआ करती है। (इसलिए) इस विषय में ज्ञानी पुरुष को मोक्ष नहीं होता।
- श्लोक २.२०न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥यह (आत्मा) न तो कभी जन्मता है और न मरता ही है; ऐसा भी नहीं है कि यह (एक बार) होकर फिर होने का नहीं है; यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है, एवं शरीर का वध हो जाएँ तो भी मारा नहीं जाता।
- श्लोक २.२२वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥जिस प्रकार (कोई) मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए ग्रहण करता है, उसी प्रकार देही अर्थात् शरीर का स्वामी पुराने शरीर त्याग कर दूसरे नए शरीर धारण करता है।
- श्लोक २.२३नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥इसे अर्थात् आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, इसे आग जला नहीं सकती, वैसे ही इसे पानी भिगा या गला नहीं सकता और वायु सुखा भी नहीं सकती है।
- श्लोक १५.७ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥जीवलोक (कर्मभूमि) में मेरा ही सनातन अंश जीव होकर प्रकृति में रहने वाली मन सहित छः, अर्थात् मन और पाँच (सूक्ष्म) इन्द्रियों को (अपनी ओर) खींच लेता है (इसी के लिंग-शरीर कहते है)।