जब मन हो
अहंकार में
४ श्लोक
- श्लोक ३.२७प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥प्रकृति के (सत्त्व-रज-तम) गुणों से सब प्रकार कर्म हुआ करते हैं; पर अहंकार से मोहित (अज्ञानी पुरुष) समझता है कि मैं कर्ता हूँ;
- श्लोक ५.८नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥योगयुक्त तत्त्ववेत्ता पुरुष को समझना चाहिए, कि मैं कुछ भी नहीं करता; (और) देखने में, सुनने में, स्पर्श करने में, खाने में, सूँघने में, चलने में, सोने में, साँस लेने-छोड़ने में,
- श्लोक १६.४दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥हे पार्थ! दम्भ, दर्प, अतिमान, क्रोध, पारुष्य अर्थात् निष्ठुरता और अज्ञान, आसुरी यानी राक्षसी सम्पत्ति में जन्मे हुए को प्राप्त होते है।
- श्लोक १८.५८मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥मुझमें चित्त रखने पर तू मेरे अनुग्रह के संकटों को अर्थात् कर्म के शुभाशुभ फलों को पार कर जावेगा। परन्तु यदि अहंकार के वश हो मेरी न सुनेगा तो (अलबत) नाश पावेगा।