मूल श्लोक
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
लिप्यंतरण (रोमन)
maccittaḥ sarvadurgāṇi matprasādāttariṣyasi atha cettvamahaṅkārānna śroṣyasi vinaṅkṣyasi
अनुवाद
मुझमें चित्त रखने पर तू मेरे अनुग्रह के संकटों को अर्थात् कर्म के शुभाशुभ फलों को पार कर जावेगा। परन्तु यदि अहंकार के वश हो मेरी न सुनेगा तो (अलबत) नाश पावेगा।
टिप्पणी
58 वें श्लोक के अन्त में अहंकार का परिणाम बतलाया है; अब यहाँ उसी का अधिक स्पष्टीकरण करते है–
— Lokmanya Tilak