भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता १६.४ ·

English

मूल श्लोक

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

dambho darpo'bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm

१६.४अध्याय १६ · दैवासुरसम्पद्विभागयोग२४ में से श्लोक ४

अनुवाद

हे पार्थ! दम्भ, दर्प, अतिमान, क्रोध, पारुष्य अर्थात् निष्ठुरता और अज्ञान, आसुरी यानी राक्षसी सम्पत्ति में जन्मे हुए को प्राप्त होते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

महाभारत-शान्तिपर्व के 164 और 165 अध्यायों में इनमें से कुछ दोषों का वर्णन है और अन्त में यह बतला दिया है, कि नृशंस किसे कहना चाहना चाहिए। इस श्लोक में 'अज्ञान' को आसुरी सम्पत्ति का लक्षण कह देने से प्रकट होता है कि 'ज्ञान' दैवी सम्पत्ति का लक्षण है। जगत में पाए जाने वाले दो प्रकार के स्वभावों का इस प्रकार वर्णन हो जाने पर –

— Lokmanya Tilak

अध्याय १६, श्लोक १६.४