जब मन हो
लोभ और कामना
५ श्लोक
- श्लोक २.७०आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥चारों ओर से (पानी) भरते जाने पर भी जिसकी मर्यादा नहीं डिगती, ऐसे समुद्र में जिस प्रकार सब पानी चला जाता है, उसी प्रकार जिस पुरुष में समस्त विषय (उसकी शान्ति भंग हुए बिना ही) प्रवेश करते है, उसे ही (सच्ची) शान्ति मिलती है। विषयों की इच्छा करनेवाले को (यह शान्ति ) नहीं ( मिलती)।
- श्लोक २.७१विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः । निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥जो पुरुष सब काम अर्थात् आसक्ति , छोड़कर और निःस्पृह हो करके (व्यवहार में) बर्ता है, एवं जिसे ममत्व और अहंकार नहीं होता, उसे ही शान्ति मिलती है।
- श्लोक ३.३७श्रीभगवानुवाच । काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥श्रीभगवान ने कहा: इस विषय में यह समझो कि रजोगुण से उत्पन्न होनेवाला बड़ा पेटू और बड़ा पापी यह काम एव यह क्रोध ही शत्रु है।
- श्लोक ३.३९आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥हे कौन्तेय! ज्ञाता का यह कामरूपी नित्यवैरी कभी भी तृप्त न होना वाला अग्नि ही है; इसने ज्ञान को ढक रखा है।
- श्लोक १६.२१त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं। ये हमारा नाश कर डालते हैं; इसलिए इन तीनों का त्याग करना चाहिए।