भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता २.७१ ·

English

मूल श्लोक

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati

२.७१अध्याय २ · साङ्ख्ययोग७२ में से श्लोक ७१

अनुवाद

जो पुरुष सब काम अर्थात् आसक्ति , छोड़कर और निःस्पृह हो करके (व्यवहार में) बर्ता है, एवं जिसे ममत्व और अहंकार नहीं होता, उसे ही शान्ति मिलती है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

संन्यास-मार्ग के टीकाकार इस 'चरित' (बर्ता है) पद का 'भीख माँगता फिरता है' ऐसा अर्थ करते है; परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है। पिछले 64 वें और 67 वें श्लोक में 'चरन्' एवं 'चरतां' का अर्थ है, वही अर्थ यहाँ भी करना चाहिए। गीता में ऐसा उपदेश कहीं भी नहीं है कि स्थितप्रज्ञ भिक्षा माँगा करें। हाँ, इसके विरुद्ध 64 वें श्लोक में यह स्पष्ट कह दिया है कि स्थितप्रज्ञ पुरुष इन्द्रियों को अपने स्वाधीन रखकर 'विषयों में बर्ते।' अतएव 'चरित' का ऐसा ही अर्थ करना चाहिए कि 'बर्ता हैं,' अर्थात् 'जगत के व्यवहार करता है।' श्रीसमर्थ रामदास स्वामी ने दासबोध के उत्तरार्ध में इस बात का उत्तम वर्णन किया है कि 'निःस्पृह' चतुर पुरुष (स्थितप्रज्ञ) व्यवहार में कैसे बर्ता है; और गीतारहस्य के चौदहवें प्रकरण का विषय ही वही है।

— Lokmanya Tilak

अध्याय २, श्लोक २.७१