भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.४ ·

English

मूल श्लोक

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

yadā hi nendriyārtheṣu na karmasvanuṣajjate sarvasaṅkalpasaṃnyāsī yogārūḍhastadocyate

६.४अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ४

अनुवाद

क्योंकि जब वह इन्द्रियों के (शब्द-स्पर्श आदि) विषयों में और कर्मों में अनुषक्त नहीं होता तथा सब संकल्प अर्थात् काम्यबुद्धि-रूप फलाशा का (प्रत्यक्ष कर्मों का नहीं) संन्यास करता है, तब उसको योगारूढ कहते है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

कह सकते है, कि यह श्लोक पिछले श्लोक के साथ और पहले तीनों श्लोकों के साथ भी मिला हुआ है, इससे गीता का यह अभिप्राय स्पष्ट होता है, कि योगारूढ पुरुष को कर्म न छोड़ कर केवल फलाशा या काम्यबुद्धि छोड़कर शान्त चित्त से निष्काम कर्म करना चाहिए। 'संकल्प का संन्यास' ये शब्द ऊपर दूसरे श्लोक में आए हैं, वहाँ इनका जो अर्थ है, वही इस श्लोक में भी लेना चाहिए। कर्मयोग में ही फलाशा-त्यागरूपी संन्यास का समावेश होता है, और फलाशा छोड़ कर्म करनेवाले पुरुष को सच्चा संन्यास और योगी अर्थात् योगारूढ कहना चाहिए। अब यह बतलाते है, कि इस प्रकार के निष्काम कर्मयोग या फलाशा-संन्यास की सिद्धि प्राप्त कर लेना प्रत्येक मनुष्य के अधिकार में है। जो स्वयं प्रयत्न करेगा, उसे इसका प्राप्त हो जाना कुछ असम्भव नहीं –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.४