भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ६.३ ·

English

मूल श्लोक

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥

लिप्यंतरण (रोमन)

ārurukṣormuneryogaṃ karma kāraṇamucyate yogārūḍhasya tasyaiva śamaḥ kāraṇamucyate

६.३अध्याय ६ · अध्यात्मयोग४७ में से श्लोक ३

अनुवाद

(कर्म-) योगारूढ होने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए कर्म को (शम का) कारण अर्थात् साधन कहा है; और उसी पुरुष के योगारूढ अर्थात् पूर्ण योगी हो जाने पर उसके लिए (आगे) शम (कर्म का) कारण हो जाता है।

— Lokmanya Tilak

टिप्पणी

टीकाकारों ने इस श्लोक के अर्थ का अनर्थ कर डाला है। श्लोक के पूर्वार्ध में योग = कर्मयोग यही अर्थ है, और यह बात सभी को मान्य है, कि उसकी सिद्धि के लिए पहले कर्म ही कारण होता है। किन्तु 'योगारूढ होने पर उसी के लिए शम कारण हो जाता है' इसका अर्थ टीकाकारों ने संन्यासप्रधान कर डाला है। उनका कथन यों है - 'शम' = कर्म का 'उपशम'; और जिसे योग सिद्ध हो जाता है, उसे कर्म छोड़ देना चाहिए! क्योंकि उनके मत में कर्मयोग संन्यास का अंग अर्थात् पूर्वसाधन है। परन्तु यह अर्थ साम्प्रदायिक आग्रह का है, जो ठीक नहीं है। इसका पहला कारण यह है कि (1) अब इस अध्याय के पहले ही श्लोक में भगवान ने कहा है, कि कर्मफल का आश्रय न करके 'कर्तव्य कर्म' करनेवाला पुरुष ही सच्चा योगी अर्थात् योगारूढ है – कर्म न करनेवाला (अक्रिय) सच्चा योगी नहीं है; तब यह मानना सर्वथा अन्याय्य है कि तीसरे श्लोक में योगारूढ पुरुष को कर्म का शम करने के लिए या कर्म छोड़ने के लिए भगवान कहेंगे। संन्यासमार्ग का यह मत भले ही हो, कि शान्ति मिल जाने पर योगारूढ पुरुष को कर्म न करें, परन्तु गीता को यह मत मान्य नहीं है। गीता में अनेक स्थानों पर स्पष्ट उपदेश किया गया है, कि कर्मयोगी सिद्धावस्था में भी यावजीवन भगवान के समान निष्कामबुद्धि से सब कर्म केवल कर्तव्य समझ कर करता रहे (गी॰ 2.71; 3.7 और 19; 4.19 – 21, 5.7 – 12; 12.12; 18.57; तथा गीतार॰ प्र॰ 11 और 12 देखो)। (2) दूसरा कारण यह है कि 'शम' का अर्थ 'कर्म का शम' कहाँ से आया? भगवद्गीता में 'शम' शब्द दो चार बार आया है, (गी॰ 10.4; 18.42) वहाँ और व्यवहार में भी उसका अर्थ 'मन का शान्ति ' है। फिर इसी श्लोक में 'कर्म की शान्ति ' अर्थ क्यों लें? इस कठिनाई को दूर करने के लिए गीता के पैशाचभाष्य में 'योगारूढस्य तस्यैव' के 'तस्यैव' इस दर्शक सर्वनाम का सम्बन्ध 'योगारूढस्य' से न लगाकर 'तस्य' को नपुंसक लिंग की षष्ठी विभक्ति समझ करके ऐसा अर्थ किया है कि 'तस्यैव कर्मणः शमः' (तस्य अर्थात् पूर्वार्ध के कर्म का शम)! किन्तु यह अन्वय भी सरल नहीं है। क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं, कि योगाभ्यास करनेवाले जिस पुरुष का वर्णन इस श्लोक के पूर्वार्ध में किया गया है, उसकी जो स्थिति, अभ्यास पूरा हो चुकने पर होती है, उसे बतलाने के लिए उत्तरार्ध का आरम्भ हुआ है। अतएव, 'तस्यैव' पदों से 'कर्मणः एव' यह अर्थ लिया नहीं जा सकता; अथवा यदि ले ही ले, तो उसका सम्बन्ध 'शम' से न जोड़कर 'कारणमुच्यते' के साथ जोड़ने से ऐसा अन्वय लगता है, 'शमः योगारूढस्य तस्यैव कर्मणः कारणमुच्यते,' और गीता के सम्पूर्ण उपदेश के अनुसार उसका यह अर्थ भी ठीक लग जाएगा कि 'अब योगारूढ के कर्म का ही शम कारण होता है।' (3) टीकाकारों के अर्थ को त्याज्य मानने का तीसरा कारण यह है, कि संन्यासमार्ग के अनुसार योगारूढ पुरुष के कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं रह जाती, उसके सब कर्मों का अन्त शम में ही होता है; और जो यह सच है तो 'योगारूढ को शम करण होता है' इस वाक्य का 'कारण' शब्द बिलकुल ही निरर्थक हो जाता है। 'कारण' शब्द सदैव सापेक्ष है। 'कारण' कहने से उसको कुछ न कुछ 'कार्य' अवश्य चाहिए, और संन्यासमार्ग के अनुसार योगारूढ को तो कोई भी 'कार्य' शेष नहीं रह जाता। यदि शम को मोक्ष का 'कारण' अर्थात् साधन कहें तो मेल नहीं मिलता। क्योंकि मोक्ष का साधन ज्ञान है, शम नहीं। अच्छा, शम को ज्ञानप्राप्ति का 'कारण' अर्थात् साधन करें, तो यह वर्णन योगारूढ अर्थात् पूर्णावस्था को ही पहुँचे पुरुष का है, इसलिए उसको ज्ञान-प्राप्ति तो कर्म के साधन से पहिले ही हो चुकती है। फिर यह शम 'कारण' है ही किसका? संन्यासमार्ग के टीकाकारों से इस प्रश्न का कुछ भी समाधानकारक उत्तर देते नहीं बनता। परन्तु उनके इस अर्थ को छोड़कर विचार करने लगें, तो उत्तरार्ध का अर्थ करने में पूर्वार्ध का 'कर्म' पद सान्निध्य-सामर्थ्य से सहज ही मन में आ जाता है; और फिर यह अर्थ निष्पन्न होता है कि योगारूढ पुरुष को लोकसंग्रहकारक कर्म करने के लिए अब 'शम' 'कारण' या साधन हो जाता है, क्योंकि उसका कोई स्वार्थ शेष नहीं रह गया है, तथापि लोकसंग्रहकारक कर्म किसी से छूट नहीं सकते (देखो गी॰ 3.17 – 19)। पिछले अध्याय में जो यह वचन है कि 'युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठि कीम्' (गी॰ 5.12) – कर्मफल का त्याग करके योगी पूर्ण शान्ति पाता है – इससे भी यही अर्थ सिद्ध होता है। क्योंकि उसमें शान्ति का सम्बन्ध कर्मत्याग से न जोड़कर केवल फलाशा के त्याग से ही वर्णित है, वहीं पर स्पष्ट कहा है, कि योगी जो कर्म-संन्यास करें वह 'मनसा' अर्थात् मन से करें (गी॰ 5.13), शरीर के द्वारा या केवल इन्द्रियों के द्वारा उसे कर्म करना ही चाहिए। हमारा यह मत है कि अलंकार-शास्त्र के अन्योन्यालंकार का-सा अर्थ-चमत्कार या सौरस्य इस श्लोक में सध गया है; और पूर्वार्ध में यह बतलाकर कि 'शम' का कारण 'कर्म' कब होता है, उत्तरार्ध में इसके विपरीत वर्णन किया है, कि 'कर्म' का कारण 'शम' कब होता है। भगवान कहते है कि प्रथम साधनावस्था में 'कर्म' ही शम का अर्थात् योगसिद्धि का कारण है। भाव यह है कि यथाशक्ति निष्काम कर्म करते-करते ही चित्त शान्त होकर उसी के द्वारा अन्त में पूर्ण योगसिद्धि हो जाती है। किन्तु योगी के योगारूढ होकर सिद्धावस्था में पहुँच जाने पर कर्म और शम का उक्त कार्यकारण-भाव बदल जाता है यानी कर्म शम का कारण नहीं होता, किन्तु शम ही कर्म का कारण बन जाता है, अर्थात् योगारूढ पुरुष अपने सब काम अब कर्तव्य समझ कर, फल की आशा न रख करके, शान्त चित्त से किया करता है। सारांश, इस श्लोक का भावार्थ नहीं है कि सिद्धावस्था में कर्म छूट जाता है; गीता का कथन है, कि साधनावस्था में 'कर्म' और 'शम' के बीच जो कार्य-कारण भाव होता है, सिर्फ वही सिद्धावस्था में बदल जाता है (गीतारहस्य पृ. 322 – 323)। गीता में यह कहीं भी नहीं कहा, कि कर्मयोगी अन्त को अन्त में कर्म छोड़ देना चाहिए, और ऐसा कहने का उद्देश्य भी नहीं है। अतएव अवसर पाकर किसी ढंग से गीता के बीच के ही किसी श्लोक का संन्यासप्रधान अर्थ लगाना उचित नहीं है। आजकल गीता के बहुतेरों को दुर्बोध सी हो गई है, इसका कारण भी यही है। अगले श्लोक की व्याख्या से यही अर्थ व्यक्त होता है, कि योगारूढ पुरुष को कर्म करना चाहिए। वह श्लोक यह है –

— Lokmanya Tilak

अध्याय ६, श्लोक ६.३